आशीष जैन / Aashish Jain

हर दर्द की तासीर है माँ
हर क़द्र की तस्वीर है माँ
आँखे भर आती हे उसकी जब दर्द मुझे कोई साताता है
डर रुलाता हे रातो को कोई जब
माँ छिपा लेती है आँचल में तब
भूखा जब लौटता हूँ घर को वापस
आपनी थाली भी परोस देती है
और गर गर्मी हो तो एक हाथ से
पंखा झल के रोटी भी खिला देती हे
माँ है माँ
मुझमे माँ मेरी माँ
माँ से में

दिल के इरादे

मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं,

स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं,

हौसला मत हार गिर कर ओ मुसाफिर,

ठोकरें इन्सान को चलना सिखाती हैं |