अकबर हैदराबादी /Akbar Haidarabadi

अकबर हैदराबादी /Akbar Haidarabadi

आँख में आँसू का

आँख में आँसू का और दिल में लहू का काल है
है तमन्ना का वही जो ज़िंदगी का हाल है

यूँ धुआँ देने लगा है जिस्म ओ जाँ का अलाओ
जैसे रग रग में रवाँ इक आतिश-ए-सय्याल है

फैलते जाते हैं दाम-ए-नारसी के दाएरे
तेरे मेरे दरमियाँ किन हादसों का जाल है

घिर गई है दो ज़मानों की कशाकश में हयात
इक तरफ ज़ंजीर-ए-माज़ी एक जानिब हाल है

हिज्र की राहों से 'अकबर' मंज़िल-ए-दीदार तक
यूँ है जैसे दरमियाँ इक रौशनी का साल है.

दूर तक बस इक धुंदलका

दूर तक बस इक धुंदलका गर्द-ए-तंहाई का था
रास्तों को रंज मेरी आबला-पाई का था

फ़स्ल-ए-गुल रुख़्सत हुई तो वहशतें भी मिट गईं
हट गया साया जो इक आसेब-ए-सहराई का था

तोड़ ही डाला समंदर ने तिलिस्म-ए-ख़ुद-सरी
ज़ोम क्या क्या साहिलों को अपनी पहनाई का था

और मुबहम हो गया पैहम मुलाक़ातों के साथ
वो जो इक मौहूम सा रिश्ता शनासाई का था

ख़ाक बन कर पत्तियाँ मौज-ए-हवा से जा मिलीं
देर से 'अकबर' गुलों पर क़र्ज़ पुरवाई का था.

बस इक तसलसुल

बस इक तसलसुल-ए-तकरार-ए-क़ुर्ब-ओ-दूरी था
विसाल ओ हिज्र का हर मरहला उबूरी था

मेरी शिकस्त भी थी मेरी ज़ात से मंसूब
के मेरी फ़िक्र का हर फ़ैसला शुऊरी था

थी जीती जागती दुनिया मेरी मोहब्बत की
न ख़्वाब का सा वो आलम के ला-शुऊरी था

तअल्लुक़ात में ऐसा भी एक मोड़ आया
के क़ुर्बतों पे भी दिल को गुमान-ए-दूरी था

रिवायतों से किनारा-कशी भी लाज़िम थी
और एहतिराम-ए-रिवायात भी ज़रूरी था

मशीनी दौर के आज़ार से हुआ साबित
के आदमी का मलाल आदमी से दूरी था

खुला है कब कोई जौहर हिजाब में 'अकबर'
गुहर के बाब में तर्क-ए-सदफ़ ज़रूरी था.

हाँ यही शहर मेरे ख़्वाबों

हाँ यही शहर मेरे ख़्वाबों का गहवारा था
इन्ही गलियों में कहीं मेरा सनम-ख़ाना था

इसी धरती पे थे आबाद समन-ज़ार मेरे
इसी बस्ती में मेरी रूह का सरमाया था

थी यही आब ओ हवा नश-ओ-नुमा की ज़ामिन
इसी मिट्टी से मेरे फ़न का ख़मीर उट्ठा था

अब न दीवारों से निस्बत है न बाम ओ दर से
क्या इसी घर से कभी मेरा कोई रिश्ता था

ज़ख़्म यादों के सुलगते हैं मेरी आँखों में
ख़्वाब इन आँखों ने क्या जानिए क्या देखा था

मेहर-बाँ रात के साए थे मुनव्वर ऐसे
अश्क आँखों में लिए दिल ये सरासीमा था

अजनबी लगते थे सब कूचा ओ बाज़ार 'अकबर'
ग़ौर से देखा तो वो शहर मेरा अपना था.

ये कौन मेरी तिश्नगी बढ़ा बढ़ा के चल दिया

ये कौन मेरी तिश्नगी बढ़ा बढ़ा के चल दिया
कि लौ चिराग़-ए-दर्द की बढ़ा बढ़ा के चल दिया

ये मेरा दिल ही जानता है कितना संग-दिल है वो
कि मुझ से अपनी दोस्ती बढ़ा बढ़ा के चल दिया

बिछड़ के उस से ज़िंदगी वबाल-ए-जान हो गई
वो दिल में शौक़-ए-ख़ुद-कुशी बढ़ा बढ़ा के चल दिया

करूँ तो अब मैं किस से अपनी वुसअत-ए-नज़र की बात
वो मुझ में हिस्स-ए-आगही बढ़ा बढ़ा के चल दिया

न दीद की उमीद अब न लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-विसाल
कि लय वो साज़-ए-हिज्र की बढ़ा बढ़ा के चल दिया

वो आया 'अकबर' इस अदा से आज मेरे सामने
कि इक झलक सी ख़्वाब की दिखा दिखा के चल दिया

सायों से भी डर जाते हैं कैसे कैसे लोग

सायों से भी डर जाते हैं कैसे कैसे लोग
जीते-जी ही मर जाते हैं कैसे कैसे लोग

छोड़ के माल-ओ-दौलत सारी दुनिया में अपनी
ख़ाली हाथ गुज़र जाते हैं कैसे कैसे लोग

बुझे दिलों को रौशन करने सच को ज़िंदा रखने
जान से अपनी गुज़र जाते हैं कैसे कैसे लोग

अक़्ल-ओ-ख़िरद के बल बूते पर सब को हैराँ कर के
काम अनोखे कर जाते हैं कैसे कैसे लोग

हो बे-लौस मोहब्बत जिन की ग़नी हों जिन के दिल
दामन सब के भर जाते हैं ऐसे ऐसे लोग

दहकते कुछ ख़याल हैं अजीब अजीब से

दहकते कुछ ख़याल हैं अजीब अजीब से
कि ज़ेहन में सवाल हैं अजीब अजीब से

था आफ़्ताब सुब्ह कुछ तो शाम को कुछ और
उरूज और ज़वाल हैं अजीब अजीब से

हर एक शाहराह पर दुकानों में सजे
तरह तरह के माल हैं अजीब अजीब से

वो पास हो के दूर है तो दूर हो के पास
फ़िराक़ और विसाल हैं अजीब अजीब से

निकलना इन से बच के सहल इस क़दर नहीं
क़दम क़दम पे जाल हैं अजीब अजीब से

अदब फ़क़त अदब है? या है तर्जुमान-ए-ज़ीस्त?
मिरे यही सवाल हैं अदीब अदीब से