Amreesh Srivastav

अम्बरीष श्रीवास्तव / Ambarish Srivastava

अम्बरीष श्रीवास्तव / Ambreesh Srivastav

बचपन के दिन

टिमटिम तारे, चंदा मामा
माँ की थपकी मीठी लोरी
सोंधी मिट्टी, चिड़ियों की बोली
लगती प्यारी माँ से चोरी

सुबह की ओस सावन के झूले
खिलती धूप में तितली पकड़ना
माँ की घुड़की, पिता का प्यार
रोते रोते हँसने लगना

पल में रूठे, पल में हँसते
अपने-आप से बातें करना
खेल-खिलौने, साथी-संगी
इन सबसे पल भर में झगड़ना

लगता है वो प्यारा बचपन
शायद लौट के न आए
जहाँ उसे छोड़ा था हमने
वहीं पे हमको मिल जाए

शहीदों के लहू का वो…..

सब भूल गया आज खिली ये बहार है ........
है गर्दिशे नसीब चली जो बयार है ..............

शहीदों के लहू का वो फुहारा याद आता है
वो मंजर याद आते हैं नज़ारा याद आता है
लिखी है हमने आजादी इबारत खूँ के कतरों से
मिटाने को उसे भी हम लगे हैं नाज़ नखरों से
बहुत दिल पर चले आरे दोबारा याद आता है
वो मंजर याद आते हैं नज़ारा याद आता है

शहीदों के लहू का वो फुहारा याद आता है
वो मंजर याद आते हैं नज़ारा याद आता है

हमी दुश्मन हैं अपनों के खुदी पे वार करते हैं
लगाते घाव अपनों को नहीं वो प्यार करते हैं
मिटा डाला वो अपनापन बेचारा याद आता है
वो मंजर याद आते हैं नज़ारा याद आता है

शहीदों के लहू का वो फुहारा याद आता है
वो मंजर याद आते हैं नज़ारा याद आता है

अभी भी कुछ न बिगड़ा है संभल जाओ मेरे भाई
नशा दौलत का छोडो अब चले आओ मेरे भाई
न खेलो खेल खुदगर्जी, सहारा याद आता है
वो मंजर याद आते हैं नज़ारा याद आता है

शहीदों के लहू का वो फुहारा याद आता है
वो मंजर याद आते हैं नज़ारा याद आता है

जिसे आशीष देती ये

गाय तो मातु है अपनी इसे चाहेंगे हम सारे
बहाए दूध की धारा इसे पालेंगें हम सारे
करो उपयोग गोबर का है इसका मूत्र तक अमृत
...वैतरणी पार ले जाये इसे पूजेंगें हम सारे ...........

इसे रब नें बनाया है बहुत ही पाक लगती ये
हमें सेहत की दुनिया में सदा आबाद रखती ये
जहन्नुम में सदा जाता जो इसकी गोकुशी करता
उसे सौंपे ये जन्नत ही जिसे आशीष देती ये .........

पावस ऋतु

पावस ऋतु
प्रियतम की आस
मन मयूर
आने को फिर
ठंडी ठंडी फुहार
झूमते वृक्ष
भीगा आँचल
चितचोर मौसम
बिहंसे मन
पक्के हैं टैंक
पानी से लबरेज
छोटे मगर
चतुर्दिक दृश्य
भवनों के जंगल
बहुमंजिले
लगता हंस
बगुला या भगत
दिल में चोर
बसेरा कहाँ
अब नहीं जंगल
चिंतित मोर
सुंदर तन
बदसूरत पाँव
वाह रे भाग्य
स्वार्थ में अँधा
आखिर कब तक
यह इंसान

बरसात का ये मौसम

धरती हुई है धानी बरसात का ये मौसम.
कुदरत हुई सुहानी जज्बात का ये मौसम.
खिड़की से झांक लो जी मन मोर नाचने को-
दिखते सभी भगत हैं कुछ बात का ये मौसम..

छाँव आने को है

आ गयी ताजगी दिल लुभाने को है.
राह देखे मगन पी मनाने को है.
खोल लें खिड़कियाँ आज मन की सभी
धूप जाने को है छाँव आने को है..

इस जहाँ में सभी मुस्कुराते रहें.

इस जहाँ में सभी मुस्कुराते रहें.
गीत खुशियों के यूं ही गाते रहें.
आओ कर लें दुआ दूसरों के लिए-
फूल गुलशन में यूं ही खिलाते रहें..