अनिल वर्मा ‘मीत’ / Anil Verma 'Meet'

अनिल वर्मा ‘मीत’ / Anil Verma 'Meet'

मेरी बानी ख़ुद बोलेगी आज नहीं तो कल

मेरी बानी ख़ुद बोलेगी आज नहीं तो कल
ख़ामोशी भी लब खोलेगी आज नहीं तो कल
अलसाई आँखें खोलेगी आज नहीं तो कल
मन की कोयलिया बोलेगी आज नहीं तो कल

हरदम डरकर रहना इसको कहाँ गवारा है
हिम्मत अपने पर तोलेगी आज नहीं तो कल

अपनेपन की तर्ज़ तुम्हारी मेरे जीवन में
रंग मुहब्बत का घोलेगी आज नहीं तो कल

मीत तुझे आवारा कहने वाली ये दुनिया
तेरे पीछे ख़ुद हो लेगी आज नहीं तो कल

हादसा गर हुआ नहीं होता

हादसा गर हुआ नहीं होता
आदमी वो बुरा नहीं होता

आदमी आदमी से डरता है
ख़ौफ़ दिल से जुदा नहीं होता

कब किधर से कहाँ को जाना है
आदमी को पता नहीं होता

कोई इमदाद ही नहीं करता
मेहरबाँ गर ख़ुदा नहीं होता

काश तेरी परेशां ज़ुल्फ़ों को
शाने तक ने छुआ नहीं होता

जो जुबाँ से तुम्हारी निकला था
काश मैंने सुना नहीं होता

कौन जाने नज़र से उनकी ‘मीत’
दूर क्यों आईना नहीं होता

दिल में ख़ुशी भर जाएगा

वो यक़ीनन ही हर एक दिल में ख़ुशी भर जाएगा
जो अंधेरी बस्तियों में रोशनी कर जाएगा

दौर ज़ुल्मों का अगर रोका गया न दोस्तो
आदमी ख़ुद आदमी के नाम से डर जाएगा

शर्म यूँ नीलाम होने आ गई बाज़ार में
शर्म गर बाक़ी रही तो आदमी मर जाएगा

लूटता फिरता है सबको तीरगी के नाम पर
देखना वो रोशनी के नाम से डर जाएगा

दिल दुखाना, आह भरना और रोना दोस्तो
‘मीत’-सा आशिक़ जहाँ में जीते जी मर जाएगा

हैरान कर दिया है

फिर उसने आज मुझको हैरान कर दिया है
मेरे ही घर में मुझको मेहमान कर दिया है

पहले नज़र मिलेगी फिर वारदात होगी
क़ातिल ने आज खुलकर ऐलान कर दिया है

नज़रों से दूर मेरी जिसका असर न होगा
इतना हसीन मुझ पर एहसान कर दिया है

मरहम भी अब लगाऊँ तो फ़ैज़ कुछ न होगा
ज़ख्मी हर एक दिल का अरमान कर दिया है

तेरी हयात बन कर दुनिया में कौन आया
दिल किसने ‘मीत’ तुझ पर क़ुर्बान कर दिया है

मुहब्बत में अब रंग आने लगा है

मुहब्बत में अब रंग आने लगा है
कि वो मुझसे नज़रें चुराने लगा है

यक़ीनन यक़ीं डगमगाने लगा है
मुझे फिर से वो आज़माने लगा है

जो वादा किया है निभा न सकोगे
ये चेहरा तुम्हारा बताने लगा है

जिसे ला के साहिल पे छोड़ा था हमने
वो तूफान सर को उठाने लगा है

ख़ुदा जाने क्या देखा दिल ने अचानक
वे क्यों छोड़कर मुझको जाने लगा है

जिसे नाज़ कल तक रहा दोस्ती पर
वही दुश्मनी अब निभाने लगा है

मेरे ‘मीत’ मुझ पर भरोसा नहीं क्या
जो तू राज़ अपना छुपाने लगा है

दिल मेरा तेरी रहगुज़र में नहीं

दिल मेरा तेरी रहगुज़र में नहीं
फ़ासला अब मेरी नज़र में नहीं

मेरा साया मेरी नज़र में नहीं
कोई साथी भी अब सफ़र में नहीं

ये मुक़द्दर मिले, मिले न मिले
चाह मंज़िल की किस बशर में नहीं

दिन ढला है कि रात बाक़ी है
ताब इतनी भी अब नज़र में नहीं

जाने किस सम्त बढ़ रहे हैं क़दम
होश इतना भी अब सफ़र में नहीं

खेलता हूँ हर एक मुश्क़िल से
हौसला क्या मेरे जिगर में नहीं

ढूंढता फिर रहा हूँ मुद्दत से
‘मीत’ मिलता किसी नगर में नहीं

ज़माना देखता रह जाएगा

सिर्फ़ हैरत से ज़माना देखता रह जाएगा
बाद मरने के कहाँ किसका पता रह जाएगा

अपने-अपने हौसले की बात सब करते रहे
ये मगर किसको पता था सब धरा रह जाएगा

तुम सियासत को हसीं सपना बना लोगे अगर
फिर तुम्हें जो भी दिखेगा क्या नया रह जाएगा

मंज़िलों की जुस्तजू में बढ़ रहा है हर कोई
मंज़िलें गर मिल गईं तो बाक़ी क्या रह जाएगा

‘मीत’ जब पहचान लोगे दर्द दिल के घाव का
फिर कहाँ दोनों में कोई फ़ासला रह जाएगा

रुकना इसकी रीत नहीं है

रुकना इसकी रीत नहीं है
वक़्त क़िसी का मीत नहीं है

जबसे तन्हा छोड़ गए वो
जीवन में संगीत नहीं है

माना छल से जीत गए तुम
जीत मगर ये जीत नहीं है

जिसको सुनकर झूम उठे दिल
ऐसा कोई गीत नहीं है

जाने किसका श्राप फला है
सपनों में भी ‘मीत’ नहीं है

फ़ासला कम अगर नहीं होता

फ़ासला कम अगर नहीं होता
फ़ैसला उम्र भर नहीं होता

कौन सुनता मेरी कहानी को
ज़िक्र तेरा अगर नहीं होता

बात तर्के-वफ़ा के बाद करूँ
हौसला अब मगर नहीं होता

कैसे समझाऊँ मैं तुझे ऐ दिल
सामरी हर शजर नहीं होता

तेरी रहमत का जिस पे साया हो
ख़ुद से वो बेख़बर नहीं होता

कौन कहता है ज़िन्दगानी का
रास्ता पुरख़तर नहीं होता

‘मीत’ मिलते हैं राहबर तो बहुत
पर कोई हमसफ़र नहीं होता