अंजना संधीर / Anjna Sandhir

अंजना संधीर / Anjna Sandhir

प्रेम में अंधी लड़की

टैगोर की कविता दे कर
उसने चिन्हित किया था शब्दों को
कि वो उस रानी का माली बनना चाहता है
सख़्त लड़की ने पढ़ा
सोचा कि मेरे बाग का माली बनकर
वो मेरे लिए
क्या-क्या करेगा...
खो गई सपनों में लड़की
कविता पढ़ते-पढ़ते
कि ठाकुर ने कितने रंग बिछाए हैं
जीवन में तरंगों के लिए
वो देखने लगी
माली के शब्द कि जब वो चलेगी
तो रास्तों में फ़ूल बिछा देगा ...ये माली
नौकर बन जाऐगा रानी का
रोज रंगीन दुनिया में घुमाऐगा
हो गई प्रेम में अंधी लड़की!

प्रेम में अंधी लड़की ने
आर देखा न पार
तोड़ डालीं सारी दीवारें, भूल गई अपना आपा
मज़बूर कर दिया घर- परिवार को
संगी- सहेलियों को
एकदम, अचानक कर दिया अचंभित
किसी को भी समझ आए
उससे पहले उड़ चली सात समुन्दर पार
बनने रानी
उस माली की
लेकिन भूल गई कि माली के हाथ में
कैंची भी होती है
पर कतरने की।

अब रोज़ माली उसके पर
थोड़े-थोड़े काटता है
घायल होती, अपने मुल्क के , घर के
एक एक चेहरे को
आँसू भरी आँखों से देखती है
प्रेम में अंधी लड़की
डरती रहती है जाने कल कौन सा पर
वो काटे...

रानी का सर्वेंट नहीं
सर्वेंट की रानी परकटी
कोसती है अपने आप को
तड़पती, छटपटाती है
काश!
वो कविता प्रेम भरी
उसने पढ़ी न होती
अंधी न बनी होती, कुछ होता या न होता
पर तो सलामत रहते ।

वे चाहती हैं लौटना

ये गयाना की साँवली-सलोनी ,
काले-लम्बे बालों वाली
तीखे-तीखे नैन-नक्श, काली-काली आँखों वाली
भरी-भरी , गदराई लड़कियाँ
अपने पूर्वजों के घर, भारत
वापस जाना चाहती हैं।

इतने कष्टों के बावजूद,
भूली नहीं हैं अपने संस्कार।
सुनती हैं हिन्दी फ़िल्मी गाने
देखती हैं , हिन्दी फ़िल्में अंग्रेजी सबटाइटिल्स के साथ
जाती हैं मन्दिरों में
बुलाती हैं पुजारियों को हवन करने अपने घरों में।
और, कराती हैं हवन संस्कृत और अंग्रेजी में।

संस्कृत और अंग्रेजी के बीच बचाए हुए हैं
अपनी संस्कृति।
सजाती हैं आरती के थाल, पहनती हैं भारतीय
पोशाकें तीज-त्योहारों पर।
पकाती हैं भारतीय खाने , परोसती हैं अतिथियों को
पढ़ती रहती हैं अपनी बिछुड़ी संस्कृति के बारे में

और चाहती हैं लौटना
उन्हीं संस्कारों में जिनसे बिछुड़ गईं थीं
बरसों पहले उनकी पीढ़ियाँ।

संवाद चलना चाहिए

"तुम एक ग्लोबल पर्सन हो
वापस जा कर बस गई हो
पूर्वी देश भारत में फ़िर से
लेकिन तुम्हारी विचार धारा
अब भी यहाँ बसी है , ऐसे नहीं छोड सकतीं तुम हमें...
बहुत याद आती है तुम्हारी..."

ढलती हुई शाम के देश से
उगते हुए सूरज के देश में , सुबह- सवेरे
सात समुन्दरों को पार करती
आवाज ने अपनेपन में लपेट लिया।

अमरीका और भारत में दूरी
कहाँ है!
ईश्वर कहाँ है, उसके विचार ही चलते हैं सर्वत्र
आदमी को आदमी की तलाश होनी चाहिए
ईश्वर तो मिल ही जायेंगे

ग्लोबल पर्सन में बदल गई
ग्लोबल वूमेन।
झूल गई झूले में स्मृतियाँ
मिठास बातों की, जज्बातों की
घोल गई मिश्री
मैं यहाँ रहूँ, वहाँ रहूँ, क्या फ़र्क पड़ता है?

फ़र्क पड़ता है कर्म का
स्वभाव का , मेलमिलाप का, अपेक्षा का
रिश्तों का, संवाद का

संवाद चलना ही जीवन है
यहाँ रहो या वहाँ
संवाद चलना चाहिए।

स्वाभिमानिनी

स्वाभिमानिनी
उसने कहा
द्रौपदी शरीर से स्त्री
लेकिन मन से पुरूष है
इसीलिए पाँच-पाँच पुरुषों के साथ
निष्ठापूर्ण निर्वाह किया।

नरसंहार में भी विचलित नहीं हुई
ख़ून से सींचकर अपने बाल
तृप्ति पाई
फ़िर भूल गई इस राक्षसी अत्याचार को भी
क्या सचमुच?

मन से पुरुष स्त्रियों का यही हाल होता है
हर जगह अपमानित होना होता है
हमेशा निशाना बनना होता है।
मन से स्त्री बने पुरुष को भी

क्यों नहीं स्वीकारते सब?
सत्य ये है कि पुरुष और प्रकृति का भेद स्वीकार्य है
पुरुष समान स्त्री आकर्षित करती है
अच्छी लगती है लेकिन स्वीकार्य नहीं
क्योंकि आदमी का बौनापन जाहिर हो जाता है
मजबूत स्वाभिमानिनी स्त्री के सामने।

इसीलिए...
पहले उसका स्वाभिमान तोड़ा जाता है
फ़िर स्त्रीत्व... फ़िर कुछ और...
स्वाभिमानिनी, कौन सहेगा तुम्हारा स्वाभिमान !

किताबे-शौक में क्या क्या निशानियाँ रख दीं

किताबे-शौक़ में क्या-क्या निशानियाँ रख दीं
कहीं पे फूल, कहीं हमने तितलियाँ रख दीं।

कभी मिलेंगी जो तनहाइयाँ तो पढ़ लेंगे
छुपाके हमने कुछ ऐसी कहानियाँ रख दीं।

यही कि हाथ हमारे भी हो गए ज़ख़्मी
गुलों के शौक में काँटों पे उंगलियाँ रख दीं।

बताओ मरियम औ' सीता की बेटियों की कसम
ये किसने आग के शोलों में लड़कियाँ रख दीं।

कोई लकीर तुम्हारी तरफ़ नहीं जाती
तुम्हारे सामने हमने हथेलियाँ रख दीं।

ग़ज़ल कुछ और भी मांगे है अंजना हमसे
ये क्या कि आरिज ओ गेसू की शोख़ियाँ रख दीं।

मैं एक व्यक्ति हूं

मैं एक व्यक्ति हूं
मेरी मर्जी है, जिस से चाहूं
इच्छा से मिलूं
मां बनूं या गर्भपात करवा लूं
बच्चे को पिता का नाम दूं या न दूं
मुझे अधिकार है अपना जीवन खुद जियूं
किसी की मर्जी मुझ पर थोपी नहीं जा सकती
मैंने यह इस धरती पर आकर जाना है
इसीलिये मैं अब अपने मुल्क वापस नहीं जाना चाहती
वहां पशु और औरत की
कोई मर्ज़ी नहीं होती
मैं औरत ही नहीं एक व्यक्ति भी हूं
मैं एक व्यक्ति की तरह जीना चाहती हूं!

ज़िंदगी अहसास का नाम है

याद आते हैं
गर्मियों में उड़ते हुए रेत के कण
हवा चलते ही अचानक उड़कर, पड़ते थे आँख में
और कस के बंद हो जाती थी
अपने आप आँखें
पहुँच जाते थे हाथ अपने आप आँखों पर
धूल से आँखों को बचाने के लिए
कभी पड़ जाता था कोई कण
तो चुभने लगता था आँख में, बहने लगता था पानी
हो जाती थी लाल आँखें मसलने से
कभी फूँक मार, कभी कपड़े को अँगुली से लगा देखता था कोई
खोल कर आँखें
करता था चेष्टा आँख में पड़े कणों को बाहर निकालने की
लेकिन यहाँ
जब सूखी बर्फ़ के कण
उड़ते हैं सफ़ेद ढ़ेरों से
चमकती धूप में, सर्दी की चिलचिलाती लहर के साथ
और पड़ते हैं आँख में
तो आँख क्षणभर के लिए बंद हो जाती हैं
ठीक वैसे ही अपने आप
मगर. . .मगर किसी ठंडक का अहसास
भर देते हैं आँख में
चुभते नहीं हैं ये कण
हिमपात की समाप्ति पर रुई के ढ़ेरों या नमक के मैदानों में
बदल जाने और जम कर बर्फ़ बनने से पहले
उड़ती है रेत की तरह जो बर्फ़
पड़ती है कपड़ों पर, आँखों में
तब हाथ तो उठते हैं
आँखों को बचाने, बंद भी होती हैं आँखें अपने आप
पड़ भी जाते हैं बर्फ़ के कण
तो ठंडक देकर बन जाते हैं पानी
आँखें तो आँखें होती हैं
उन्हें रेत भी चुभती है
बर्फ़ के कण भी चुभते हैं क्षण भर के लिए
हो जाती हैं कस कर बंद
तब याद आते हैं
रेत के कणों के साथ जुड़े
अपने वतन के
कितने ही स्पर्श
जो भर देते हैं अहसास का आग
इस ठंडे देश में
ज़िंदा रहने के लिए
ज़िंदगी अहसास का ही तो नाम है।

ओवरकोट

काले-लम्बे
घेरदार ,सीधे
विभिन्न नमूनों के ओवर कोट की भीड़ में
मैं भी शामिल हो गई हूँ।

सुबह हो या शाम, दोपहर हो या रात
बर्फ़ीली हड्डियों में घुसती ठंडी हवाओं को
घुटने तक रोकते हैं ये ओवरकोट।

बसों में,सब वे स्टेशनों पर इधर-उधर दौड़ते
तेज कदमों से चलते ये कोट,
बर्फ़ीले वातावरण में अजब-सी सुंदरता के
चित्र खींचते हैं।

चाँदी सी बर्फ़ की चादरें जब चारों ओर बिछती हैं
उन्हें चीर कर जब गुजरते हैं ये कोट
तब श्वेत-श्याम से मनोहारी दृश्य
ऐसे लगते हैं
मानों किसी गोरी ने
बर्फ़ीली चादरों को नजर से बचाने के लिए
ओवरकोट रूपी तिल लगा लिया हो!

कैसे जलेंगे अलाव

ठंडे मौसम और
ठडे खानों का यह देश
धीर-धीर मानसिक और शारीरिक रूप से भी
कर देता है ठंडा।

कुछ भी छूता नहीं है तब
कँपकँपाता नहीं है तन
धड़कता नहीं है मन
मर जाता है यहाँ , मान, सम्मान और स्वाभिमान।

बन जातीं हैं आदतें दुम हिलाने की
अपने ही बच्चों से डरने की
प्रार्थनाएँ करने की
छूट जाते हैं सारे रिश्तेदार
भल जाती है खुशबू अपनी मिट्टी की
बुलाता नहीं है तब वहाँ भी कोई।
आती नहीं है चिट्टी किसी की
जिनकी खातिर मार डाला अपने स्वाभिमान को।

उड़ जाते हैं वे बच्चे भी
पहले पढ़ाई की खातिर
फ़िर नौकरी, फ़िर ढूँढ़ लेते हैं साथी भी वहीं ।
बड़ी मुश्किलों से बनाए अपने घर में भी
लगने लगता है डर
अकेले रहते।

सरकारी नर्सें आती हैं, कामकाज कर जाती हैं।
फ़ोन कर लेते हैं कभी
आते नहीं हैं बच्चे ।
उनके अपने जीवन हैं
अपने माँ-बाप, भाई-बन्धु और देश तो
पहले ही छॊड़ आये थे वो
अब ये भी छूट गए
माया मिली न राम!

सोचते हैं
धोबी के कुत्ते बने, घर के न घाट के।
घंटों सोचते रहते हैं।
खिड़की से पड़ती बर्फ़ धीरे-धीरे
हड्डियों पर भी
पड़ने लगती है।
काम की वजह से मजबूरी में
खाया बासी खाना उम्र भर
रहे ठंडे मौसम में
अब सब कुछ ठंडा-ठंडा है
मन पर पड़ी ठंडक में
भला सोचिए, कैसे जलेंगे अलाव?