Anjum Rahbar

अंजुम रहबर / Anjum Rahbar

शायरी

दिल की किस्मत बदल न पाएगा
बन्धनों से निकल न पाएगा
तुझको दुनिया के साथ चलना है
तू मेरे साथ चल न पाएगा.

दोस्ती क्या है ये दुनिया को भी अंदाजा लगे
खत उसे लिखना तो दुश्मन के पते पर लिखना.

साथ छूटे थे, साथ छूटे हैं
ख्वाब टूटे थे, ख्वाब टूटे हैं
मैं कहाँ जाकर सच तलाश करूं
आजकल आईने भी झूठे हैं.

ये तमन्ना है अंजुम, चलेंगे कभी
आपके साथ हम, आपके शहर में.

इतने करीब आके सदा (आवाज) दे गया मुझे
मैं बुझ रही थी, कोई हवा दे गया मुझे.

जंगल दिखाई देगा अगर हम यहाँ न हों
सच पूछिए, तो शहर की हलचल हैं लड़कियाँ.

उसने कहो कि गंगा के जैसी पवित्र हैं
जिनके लिए शराब की बोतल हैं लड़कियाँ.

अंजुम तुम अपने शहर के लड़कों से ये कहो
पैरों की बेड़ियाँ नहीं पायल हैं लड़कियाँ.

रंग इस मौसम में भरना चाहिए
सोचती हूँ प्यार करना चाहिए.

प्यार का इकरार दिल में हो मगर
कोई पूछे तो मुकरना चाहिए. दिल किसी की चाहत में बेकरार मत करना
प्यार में जो धोखा दे, उससे प्यार मत करना
कारोबार में दिल के तजुर्बा जरूरी है
जिंदगी का ये सौदा तुम उधार मत करना
तू मुझे मना लेना, मैं तुझे मना लूंगी
प्यार की लड़ाई में जीत-हार मत करना.

घर के लोगों को हर बात का तेरी मेरी मुलाकात का
पायलों से पता चल गया, चूड़ियों से खबर हो गई
मुझको खिड़की पे बैठे हुए, आज भी रात भर हो गई.

आज मशहूर फिर शहर में प्यार की एक कहानी हुई
एक लड़का दीवाना हुआ, एक लड़की दीवानी हुई.

मेरी आँखों की गहराई में, सबने चेहरा तेरा पढ़ लिया
आज मैं आईना देखकर पानी-पानी हुई.

वक्त बर्बाद करती रहती हूँ
रोज फरियाद करती रहती हूँ
हिचकियाँ तुझको आ रही होंगी
मैं तुझे याद करती रहती हूँ. जन्नतों को जहाँ नीलाम किया जाएगा
सिर्फ औरत को हीं बदनाम किया जाएगा
हम उसे प्यार इबादत की तरह करते हैं
अब ये ऐलान, सरेआम किया जाएगा.

नाम मेरा लेकर छेड़ते हैं उसको
क्यों मेरा दीवाना सबको खटकता है
मैं हीं नहीं पागल उसकी जुदाई में
सुनती हूँ रातों को, वो भी भटकता है
प्यार की खुशबू में दोनों नहाए हैं
मैं भी महकती हूँ वो भी महकता है.

है अगर प्यार तो, मत छुपाया करो
हमसे मिलने खुलेआम आया करो
दिल हमारा नहीं, है ये घर आपका
रोज आया करो, रोज जाया करो
प्यार करना न करना अलग बात है
कम-से-कम वक्त पर घर तो आया करो.

तेरी यादों को प्यार करती हूँ
सौ जन्म भी निसार करती हूँ
तुझको फुर्सत मिले तो आया जाना
मैं तेरा इंतजार करती हूँ.

रोशनी का जवाब होती है
खुशबुओं की किताब होती है
तोड़ लेते हैं हवस वाले, लड़कियाँ तो गुलाब होती है.

मजबूरियों के नाम पर सब छोड़ना पड़ा
दिल तोड़ना कठिन था मगर तोड़ना पड़ा
मेरी पसंद और थी सबकी पसंद और
इतनी जरा सी बात पर घर छोड़ना पड़ा.

तमाम उम्र खुदा से यही दुआ मांगी
खुदा करे कि तुझे मेरी बददुआ न लगे.

ये किसी नाम का नहीं होता
ये किसी धाम का नहीं होता
प्यार में जबतलक नहीं टूटे,
दिल किसी काम का नहीं होता. मिलना था इत्तेफाक, बिछड़ना नसीब था,
वो उतना ही दूर हो गया जितना करीब था।

मैं उसको देखने को तरसती ही रह गई,
जिस शख्स की हथेली में मेरा नसीब था।

बस्ती के सारे लोग ही आतिश परस्त थे,
घर जल रहा था जब की समंदर करीब था।

दफना दिया गया मुझे चांदी की कब्र में,
मैं जिसको चाहती थी वो लड़का गरीब था।

"अंजुम" मैं जीत कर भी यही सोचती रह गई,
जो हार कर गया बड़ा खुशनसीब था।

जिन के आँगन में अमीरी का शजर लगता है

जिन के आँगन में अमीरी का शजर लगता है
उन का हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है

चाँद तारे मिरे क़दमों में बिछे जाते हैं
ये बुज़ुर्गों की दुआओं का असर लगता है

माँ मुझे देख के नाराज़ न हो जाए कहीं
सर पे आँचल नहीं होता है तो डर होता है

आग बहते हुए पानी में लगाने आई

आग बहते हुए पानी में लगाने आई
तेरे ख़त आज मैं दरिया में बहाने आई

फिर तिरी याद नए ख़्वाब दिखाने आई
चाँदनी झील के पानी में नहाने आई

दिन सहेली की तरह साथ रहा आँगन में
रात दुश्मन की तरह जान जलाने आई

मैं ने भी देख लिया आज उसे ग़ैर के साथ
अब कहीं जा के मिरी अक़्ल ठिकाने आई

ज़िंदगी तो किसी रहज़न की तरह थी 'अंजुम'
मौत रहबर की तरह राह दिखाने आई

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं

वो बे-वफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं
कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं

समझाया बार-हा कि बचो प्यार-व्यार से
लेकिन कोई सहेली कहा मानती नहीं

मैं ने तुझे मुआफ़ किया जा कहीं भी जा
मैं बुज़दिलों पे अपनी कमाँ तानती नहीं

'अंजुम' पे हँस रहा है तो हँसता रहे जहाँ
मैं बे-वक़ूफ़ियों का बुरा मानती नहीं

रंग इस मौसम में भरना चाहिए

रंग इस मौसम में भरना चाहिए
सोचती हूँ प्यार करना चाहिए

ज़िंदगी को ज़िंदगी के वास्ते
रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए

दोस्ती से तजरबा ये हो गया
दुश्मनों से प्यार करना चाहिए

प्यार का इक़रार दिल में हो मगर
कोई पूछे तो मुकरना चाहिए

तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए

तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए
मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गए

कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में
इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए

उस वक़्त रात-रानी मिरे सूने सहन में
ख़ुशबू लुटा रही थी कि तुम याद आ गए

ईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिए
मैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गए

कल शाम छत पे मीर-तक़ी-'मीर' की ग़ज़ल
मैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए

'अंजुम' तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ़
इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए