अंशु मालवीय / Anshu Malviya

अंशु मालवीय / Anshu Malviya

हम तुमसे क्या उम्मीद करते

हम तुमसे क्या उम्मीद करते

...हम तुमसे क्या उम्मीद करते
ब्राम्‍हण देव!
तुमने तो खुद अपने शरीर के
बाएं हिस्से को अछूत बना डाला
बनाया पैरों को अछूत
रंभाते रहे मां...मां और मां,
और मातृत्व रस के
रक्ताभ धब्बों को बना दिया अछूत
हमारे चलने को कहा रेंगना
भाषा को अछूत बना दिया
छंद को, दिशा को
वृक्षों को, पंछियों को
एक-एक कर सारी सदियों को
बना दिया अछूत
सब कुछ बांटा
किया विघटन में विकास
और अब देखो ब्राम्‍हण देव
इतना सब कुछ करते हुए आज अकेले बचे तुम
अकेले...और...अछूत !

संतानें हत‌‍भागी

जब से भूख तुम्हारी जागी
धरती बिकी
बिकी धरती की संतानें हत‌भागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !

धरती के भीतर का लोहा
काढ़ा, हमने तार खिंचाए
तार पे फटी दिहाड़ी लटकी
बिजली की विरुदावलि गाए
जब से भूख तुम्हारी जागी
लोहा बिका
बिकी लोहे की संतानें हतभागी !
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !

धरती के भीतर का पानी
खींचा हमने खेत सधाए
पानी बंधुआ बोतल में
साँस नमी की घुटती जाए
जब से भूख तुम्हारी जागी
पानी बिका
बिकी पानी की संतानें हतभागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !

धरती के भीतर का कोयला
खोदा और फ़र्नेस दहकाए
चिमनी ऊपर बैठ के कोयल
कटे हाथ के असगुन गाए
जब्से भूख तुम्हारी जागी
कोयला बिका
बिकी कोयले की संतानें हतभागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !

करमन की गति न्यारी

कर्ज़ की हमको दवा बताई
कर्ज़ ही थी बीमारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।
गेहूँ उगे शेयर नगरी में
खेतों में बस भूख उग रही
मूल्य सूचकांक पे चिड़िया
गाँव शहर की प्यास चुग रही
करखानों में हाथ कट रहे
मक़तल में त्यौहारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।
बढ़ती महंगाई की रस्सी
ग्रोथ रेट बैलेन्स बनाए
घट-बढ़ के सर्कस के बाहर
भूखों के दल खेल दिखाए
मेहनत-क़िस्मत-बरकत बेचें
सरकारी व्योपारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।
शहर-शहर में बरतन मांजे
भारत माता ग्रामवासिनी
फिर भी राशनकार्ड न पाए
हर-हर गंगे पापनाशिनी
ग्लोबल गाँव हुई दुनिया में
प्लास्टिक की तरकारी
साधो !
करमन की गति न्यारी !

मार्खेज को डिमेंशिया हो गया है

मार्खेज को डिमेंशिया हो गया है।
जीवन की उत्ताल तरंगों के बीच गिर-गिर पड़ते हैं
स्मृति की नौका से बिछल-बिछलकर;
फिर भरसक-भरजाँगर
कोशिश कर बमुश्किल तमाम
चढ़ पाते हैं नौका पर,
उखड़ती साँसों की बारीक डोर थाम।
जिसे इनसानियत का सत्व मानते हैं वह
वही स्मृति साथ छोड़ रही है उनका
विस्मृति के महाप्रलय में
निरुपाय-निहत्था है हमारा स्मृतियोद्धा अब।
सामूहिक स्मृतिलोप के शिकार
माकोंडो गाँव के निवासियों की तरह
चलो हम उनके लिए चीजों पर उनके नाम लिख दें -
देखो ये बिक चुकी नदी है
ये नीलाम हो चुके पर्वत
अपने अस्तित्व ही नहीं
हमारी यादों के भी कगार पर जी रहे पंछी
ये हैं अवैध घोषित हो चुकी नस्लें
ये हैं हमारे गणराज्य
बनाना रिपब्लिक के संवैधानिक संस्करण
ये है तुम्हारा वाइन का गिलास
ये कलम, ये कागज और ये तुम हो
हमारे खिलंदड़े लेखक गेब्रिएल गार्सिया मार्खेज !
ये यादें ही तो हैं
जिन्होंने नाचना और गाना सिखाया
सिखाया बोलना और चलना
सिखाया जीना और बदला लेना,
लामकाँ में घर बनाना सिखाया
हमारे विस्थापित मनों को
हमें और किसी का भरोसा नहीं स्मृति यात्री!
धर्म ने हमारा सत्वहरण कर लिया
विज्ञान ने तानाशाहियों की दलाली की
विचारधाराओं ने राष्ट्रों के लिए मुखबिरी की
इतिहास ने हमारी परछाइयाँ बुहार दीं
हमें यादों का ही भरोसा है,
अब वह भी छिनी जाती है
बगैर किसी मुआवजे के हमारी जमीनों जैसी।
यादें जमीन हैं
आसमान के बंजरपन को
अनंतकाल से कोसती हुई।
हमारी नाल कहाँ गड़ी है?
माँ जैसे लोरी सुनाने वाले सनकी बूढ़े!
कब से यूँ ही विचर रहे हो धरती पर
हमारे प्रसव के लिए पानी गुनगुना करते,

थरथराते हाथों से दिए की लौ पकड़े हुए स्मृति धाय! हमारी नाल कहाँ गड़ी है?
कैसी हैं हमारी विच्छिन्न वल्दीयतें!
कैसे हैं इनसानियत के नकूश!
हमारे गर्भस्वप्न कैसे हैं?
किन तितलियों के पंखों में छुपे हैं
हमारे दोस्त फूलों के पुष्प पराग...!
किससे पूछें
तुमसे तो खुद जुदा हो चली हैं स्मृतियाँ
स्मृति नागरिक !
मछलियों की रुपहली पीठों पर ध्यान लगाए
पानी के ऊपर ठहरे जलपाखियों की एकाग्र साधना से पूछें,
पूछें पानी से सट कर उड़ते बगुलों की पंख समीरन से,
जमुना के गंदले पानी में टूटकर बिखरे
सूरज की किरचों से पूछें,
पूछें मरीचिका के संधान में मिथक बनते मृगों से,
डेल्टावनों की सांघातिक मक्खियों से पूछें
या पूछें अभयारण्यों में खाल के व्यापारियों से
अभय की भीख माँगते बाघों से,
अपने खेत में अपने पोसे हुए पेड़ की डाल से खुदकुशी करते
किसान के अँगोछे की गाँठ से पूछें,
या बंद कारखाने के अकल्पनीय अकेले चौकीदार से पूछें,
फ्लाई ओवर के नीचे गड़गड़ाहट से उचटी नींदों से पूछें
या पूछें सीवर से निकलती कार्बन मोनो ऑक्साइड से
किस उपनिषद- किस दर्शन के पास जवाब है इन सवालों का
सिवाय यायावर यादों की एक तवील यात्रा के
हमें हमारी गड़ी हुई नालों के स्वप्न क्यूँ आते हैं?
हमारे ज्ञानी ओझा!
हम सब डिमेन्शिया में जा रहे हैं मार्खेज!
अपने उचटे हुए हाल और बेदखल माजी के बीच झूलते
किसी और का मुस्तकबिल जीने को अभिशप्त;
ये किन अनुष्ठानों का अभिशाप है?
कि शब्द अपने अर्थ भूलते जा रहे हैं
भूलती जा रही हैं साँसें अपनी लय
खिलौने सियासत करने लगे हैं
साज लड़ने लगे हैं जंग
जिस्मफरोशी कर रही हैं रोटियाँ
और हम हथियारों का तकिया लगाने को मजबूर हैं!
हम सब डिमेन्शिया में जा रहे हैं मार्खेज
और हम इसे अलग-अलग नामों से पुकार रहे हैं
विकास, तरक्की, साझा भविष्य... या
या इतिहास गति की वैज्ञानिक नियति?
विज्ञान और नियति
माई गुडनेस!
मार्खेज तुम्हें डिमेन्शिया हो गया है और
इससे पहले कि यादों से पूरी तरह वतन बदर हो जाओ
एक बार जरूर हमारे लिए चीजों पर नाम की चिप्पियाँ लगाना
मसलन-
ये हैं यादें
ये है आजादी और
ये है लड़ना
यादों के छोर तक लड़ना!

वक्त

निजी जीवन का राजनैतिक रेखाचित्र
इकहत्तर की लड़ाई के वक्त
पैदा हुआ मैं
स्कूल गया
इमेरजेन्सी में,
मस्जिद गिरने के साथ
गया विश्वविद्यालय,
नई आर्थिक नीति का साथ
बाहर आ गया वहाँ से,
फिलहाल बेरोज़गार हूँ
और किसी बड़ी राजनीतिक घटना में
रोज़गार तलाश रहा हूँ ।