Arun Mittal

अरुण मित्तल / Arun Mittal

अरुण मित्तल / Arun Mittal

वो तनहा है

साथ में जो भी सच के रहता है
आज के दौर में वो तनहा है

मेरी आँखों में देख वो बोला
तेरा आँसू से कोई रिश्ता है

ख़ून में ज्वार अब नहीं उठता
जिस्म में और कुछ ही बहता है

ख़ुद को देखूँ तो किस तरह देखूँ
अक़्स भी अजनबी-सा लगता है

तुम बिछड़ जाओ ये सहूँ कैसे
मैंने दुनिया से तुमको छीना है

लोग भी सोचते हैं अब अक़्सर
क्या-क्या ‘अद्भुत’ ग़ज़ल में कहता है

नववर्ष की पहली किरण

ख़ुशियों भरा संसार दे, नववर्ष की पहली किरण
आनंद का उपहार दे, नववर्ष की पहली किरण

दुनिया की अंधी दौड़ में, कुछ दिल्लगी के पल मिले
सबको ही अनुपम प्यार दें, नववर्ष की पहली किरण

जर्जर हुए बदले अधर, नववर्ष की पहली किरण
नव चेतना, दे नया स्वर, नववर्ष की पहली किरण

अब आ चढ़ें नव कर्मरथ पर हर चिरंतन साधना
इस बुद्धि को कर दे प्रखर, नववर्ष की पहली किरण

सबको अटल विश्वास दे, नववर्ष की पहली किरण
नवदेह में नवश्वास दे, नववर्ष की पहली किरण

इस अवनि तल पर उतरकर, अब कर दे रौशन ये फिज़ा
उल्लास ही उल्लास दे, नववर्ष की पहली किरण

अब आ रही है मनोरम, नववर्ष की पहली किरण
यह चीरती अज्ञान तम, नववर्ष की पहली किरण

मैं छंद तुझ पर क्या लिखूँ ‘अद्भुत’ कहूँ इतना ही बस
सुस्वागतम सुस्वागतम, नववर्ष की पहली किरण

दोहे प्यार भरे

सरल, सरस, सुन्दर, सहज, जीवन का आनन्द।
प्यार तुम्हारा यूँ बसा, ज्यों गुलशन में गंध ।

ना नज़रों ने कुछ कहा, नहीं लबों का साथ।
फिर जाने हम किस तरह, समझ गए हर बात।

दिल तुझ तक ले जा रहा, मुझको हर पल खींच।
तड़पाएगा कब तलक, परदा अपने बीच।

पहले सिमटी दूरियाँ, उपजा फिर विश्वास।
मुझको तुझमें मिल गया, अपना-सा एहसास।

इक दूजे का हम अगर, बन जाएँ आधार।
हर मौसम मधुमास हो, हरसूं उठें बहार।

बदली सारी चाहतें, बदल गया व्यवहार।
डूबा तेरे प्यार में, भूला सब संसार।

तू भीतर की रोशनी, तू आंगन की धूप।
दिखता है हर रूप में, मुझको तेरा रूप।

यादों की परिकल्पना, वादों का संसार।
अनुपम है ये साधना, अद्भुत है ये प्यार।

कविता ख़ुश्बू का झोंका

कविता ख़ुश्बू का झोंका, कविता है रिमझिम सावन
कविता है प्रेम की ख़ुश्बू, कविता है रण में गर्जन
कविता श्वासों की गति है, कविता है दिल की धड़कन
हँसना-रोना मुस्काना, कवितामय सबका जीवन

कविता प्रेयसी से मिलन है, कविता अधरों पर चुंबन
कविता महकाती सबको, कविता से सुरभित यह मन
कभी मेल कराती सबसे, कभी करवाती है अनबन
कण-कण में बसती कविता, कवितामय सबका जीवन

कविता सूर के पद हैं, कविता तुलसी की माला
कविता है झूमती गाती, कवि बच्चन की मधुशाला
कहीं गिरधर की कुंडलियाँ, कहीं है दिनकर का तर्जन
ग़ालिब और मीर-बिहारी, कवितामय सबका जीवन

कविता है कभी हॅंसी तो, कभी दर्द है कभी चुभन है
बन शंखनाद जन मन में, ला देती परिवर्तन है
हैं रूप अनेकों इसके, अद्भुत कविता का चिंतन
मानव समाज का दर्शन, कवितामय सबका जीवन

मुहब्बत में जो ख़ता होती है

मुहब्बत में जो ख़ता होती है
उसकी ख़ुश्बू ही ज़ुदा होती है

इश्क़ उस से ही किया जाता है
जिससे उम्मीदे-वफ़ा होती है

मौत से जिस्म ही नहीं मरता
दिल से धड़कन भी ज़ुदा होती है

सब्र करने से पता चलता है
दर्दे-दिल की भी दवा होती है

उसकी क़ुदरत में एक शै है जो
मेरी चाहत पे फ़ना होती है

मौत ही है कि जो नहीं आती
ज़िन्दगी रोज़ ख़फ़ा होती है

क्रांति गीत

मेरे भारत की आज़ादी, जिनकी बेमोल निशानी है
जो सींच गए ख़ूँ से धरती, इक उनकी अमर कहानी है
वो स्वतंत्रता के अग्रदूत, बन दीप सहारा देते थे
ख़ुद अपने घर को जला-जला, माँ को उजियारा देते थे
उनके शोणित की बूंद-बूंद, इस धरती पर बलिहारी थी
हर तूफ़ानी ताकत उनके, पौरुष के आगे हारी थी
माँ की ख़ातिर लड़ते-लड़ते, जब उनकी साँसें सोईं थी
चूमा था फाँसी का फंदा, तब मृत्यु बिलखकर रोई थी
ना रोक सके अंग्रेज कभी, आंधी उस वीर जवानी की
है कौन क़लम जो लिख सकती, गाथा उनकी क़ुर्बानी की
पर आज सिसकती भारत माँ, नेताओं के देखे लक्षण
जिसकी छाती से दूध पिया, वो उसका तन करते भक्षण
जब जनता बिलख रही होती, ये चादर ताने सोते हैं
फिर निकल रात के साए में, ये ख़ूनी ख़ंजर बोते हैं
अब कौन बचाए फूलों को, गुलशन को माली लूट रहा
रिश्वत लेते जिसको पकड़ा, वो रिश्वत देकर छूट रहा
डाकू भी अब लड़कर चुनाव, संसद तक में आ जाते हैं
हर मर्यादा को छिन्न-भिन्न, कुछ मिनटों में कर जाते हैं
यह राष्ट्र अटल, रवि-सा उज्ज्वल, तेजोमय, सारा विश्व कहे
पर इसको सत्ता के दलाल, तम के हाथों में बेच रहे
ये भला देश का करते हैं, तो सिर्फ़ काग़ज़ी कामों में
भूखे पेटों को अन्न नहीं ये सड़ा रहे गोदामों में
अपनी काली करतूतों से, बेइज़्ज़त देश कराया है
मेरे इस प्यारे भारत का, दुनिया में शीश झुकाया है
पूछो उनसे जाकर क्यों है, हर द्वार-द्वार पर दानवता
निष्कंटक घूमें हत्यारे, है ज़ार-ज़ार क्यों मानवता
ख़ुद अपने ही दुष्कर्मों पर, घड़ियाली आँसू टपकाते
ये अमर शहीदों को भी अब, संसद में गाली दे जाते
खा गए देश को लूट-लूट, भर लिया जेब में लोकतंत्र
इन भ्रष्टाचारी दुष्टों का, है पाप यज्ञ और लूट मंत्र
गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल, देखो छाई ये वीरानी
अशफ़ाक़, भगत, बिस्मिल तुमको, फिर याद करें हिन्दुस्तानी
है कहाँ वीर आज़ाद, और वो ख़ुदीराम सा बलिदानी
जब लाल बहादुर याद करूँ, आँखों में भर आता पानी
जब नमन शहीदों को करता, तब रक्त हिलोरें लेता है
भारत माँ की पीड़ा का स्वर, फिर आज चुनौती देता है
अब निर्णय बहुत लाज़मी है, मत शब्दों में धिक्कारो
सारे भ्रष्टों को चुन-चुन कर, चौराहों पर गोली मारो
हो अपने हाथों परिवर्तन, तन में शोणित का ज्वार उठे
विप्लव का फिर हो शंखनाद, अगणित योद्धा ललकार उठें
मैं खड़ा विश्वगुरु की रज पर, पीड़ा को छंद बनाता हूँ
यह परिवर्तन का क्रांति गीत, माँ का चारण बन गाता हूँ

अकाउंटिंग के अध्यापक का प्रेम पत्र

नए-नए अकाउंटिंग के प्राध्यापक
स्वयं के प्यार में हिसाब-किताब भर बैठे
और उसी से प्रभावित होकर ये ग़लती कर बैठे
कि सारा का सारा मसाला
दिल की बजाय, दिमाग़ से निकाला
और ये पत्र लिख डाला
लिखा था-
प्रिये! मैं जब भी तुमसे मिलता हूँ
“शेयर प्रीमियम” की तरह खिलता हूँ
सचमुच तुमसे मिलकर यूँ लगता है
गुलशन में नया फूल खिल गया
या यूँ कहूँ
किसी उलझे हुए सवाल की
“बैलेंस शीट” का टोटल मिल गया
मेरी जान
जब तुम शरमाती हो
मुझे “प्रोफिट एंड लॉस” के
“क्रेडिट बैलेंस” सी नज़र आती हो
तुम्हारा वो “इन्कम टैक्स ऑफिसर” भाई
जो इकतीस मार्च की तरह आता है
मुझे बिल्क़ुल नहीं भाता है
उसकी शादी करवाकर घर बसवाओ
वरना घिस-घिस कर इतना पछताएगा
एक दिन “बैड डेब्ट” हो जाएगा
और कुछ मुझे भी संभालो
“फिक्सड असेट” के तरह ज़िन्दगी में ढालो
अपने “स्क्रैप वैल्यू” के नज़दीक आते माँ-बाप को समझाओ
किसी तरह भी मुझे उनसे मिलवाओ
उन्हें कहो तुम्हें किस बात का रोना है
तुम्हारा दामाद तो खरा सोना है
और तुम्हारा पड़ोसी पहलवान
जो बेवक़्त हिनहिनाता है
उसे कहो
मुझे “लाइव स्टॉक” अकाउंट बनाना भी आता है
“हायर अकाउंटिंग” की किताब की तरह मोटी
और उसके अक्षरों की तरह काली
वो मेरी होने वाली साली
जब भी मुस्कुराती है
मुझे “रिस्की इनवेस्टमेंट” पर
“इंट्रेस्ट रेट” सी नज़र आती है
सच में प्रिये
दिल में गहराई तक उतर जाती हो
जब तुम “सस्पेंस अकाउंट” की तरह
मेरे सपनों में आती हो
ये पत्र नहीं
मेरी धड़कने तुम्हारे साथ में हैं
अब मेरे प्यार का डेबिट-क्रेडिट तुम्हारे हाथ में है
ये यादें और ख़्वाब जब मदमाते हैं
तो ज़िन्दगी के “ट्रायल बैलेंस”
बड़ी मुश्क़िल से संतुलन में आते हैं
मैं जानता हूँ
मुझसे दूर रहकर तुम्हारा दिल भी कुछ कहता है
मेरे हर आँसू का हिसाब
तुम्हारी “कैश बुक” में रहता है
और गिले-शिक़वे तो हम उस दिन मिटाएंगे
जिस दिन प्यार का
“रिकांसिलेशन स्टेटमेंट” बनाएंगे
और हाँ
तुम मुझे यूँ ही लगती हो सही
तुम्हे किसी “विण्डो ड्रेसिंग” की ज़रूरत नहीं
मुझे लगता है
तुम्हारा ज़ेह्न किसी और आशा में होगा
“ऑडिटिंग” सीख रहा हूँ
अगला ख़त और भी भाषा में होगा
मैंने “स्लिप सिस्टम” की पद्धति
दिमाग़ में भर ली है
और तुम्हारे कॉलेज टाइम में लिखे
एक सौ पच्चीस लव लेटर्स की
“ऑडिटिंग” शुरू कर दी है
अब समझी !
मैं तुम्हारी जुदाई से
“इन्सोल्वैन्सी” की तरह डरता हूँ
मेरी जान
मैं तुम्हें “बोनस शेयर” से भी ज़्यादा प्यार करता हूँ
तुम्हारी यादों में मदहोश होकर
जब भी बोर्ड पर लिखने के लिए चॉक उठाता हूँ
“लेज़र के परफ़ोर्मा” की जगह
तुम्हारी तस्वीर बना आता हूँ
मैं तुम्हारे अन्दर अब इतना खो गया हूँ
“नॉन परफोर्मिंग असेट” हो गया हूँ
अब पत्र बंद करता हूँ
कुछ ग़लत हो
तो “अपवाद के सिद्धांत” को अपनाना
कुछ नाजायज़ हो
तो “मनी मैजरमेंट” से परे समझकर भूल जाना
“कंसिसटेंसी” ही जीवन का आधार होता है
और ज़िन्दा वही रहते हैं
जिन्हें किसी से प्यार होता है

जन जन की भाषा हो हिंदी

हर शब्द अटल निर्माण करे
नवयुग की आशा हो हिंदी
हर मन की भाषा हो हिंदी
जन-जन की भाषा हो हिंदी
पर जाने क्यों जब कहता हूँ
हिंदी को भाषा जन-जन की
तब बरबस ही उठ जाती है
एक दबी हुई पीड़ा मन की
अंग्रेजी महलों में सोती
इसकी ही बढ़ी पिपासा है
झोंपड़ियों में जो रहती है
हिंदी निर्धन की भाषा है
हिंदी में नींद नहीं आती
सपने भी लो अंग्रेजी में
अंग्रेजीमय बस हो जाओ
खाओ-खेलो अंग्रेजी में
है दौड़ लगी अंग्रेजी पर
हिंदी बस रोए दुखड़ा है
अंग्रेजी नोट है डॉलर का
हिंदी कागज़ का टुकड़ा है
अंग्रेजी मक्खन ब्रैड और
खस्ता मुर्गे की बोटी है
जबरन जो भरती पेट सदा
हिंदी वो सूखी रोटी है
हर शिक्षा कर दी अंग्रेजी
कण-कण में भर दी अंग्रेजी
खेतों में डाली अंग्रेजी
आंगन में पाली अंग्रेजी
बस मन समझाने की ख़ातिर
इक हिंदी दिवस मनाते हैं
हिंदी को ही अपनाना है
यह कहकर दिल बहलाते हैं
हम पाल रहे बचपन अपना
अंग्रेजी की घुट्टी लेकर
हिंदी का मान बढ़ाते हैं
अंग्रेजी में भाषण देकर
अब तो तुतलाते स्वर को भी
अंग्रेजी की अभिलाषा है
अंग्रेजी बोले वह शिक्षित
हिंदी अनपढ़ की भाषा है
सब भाग रहे मदहोश हुए
सब सीख रहे हैं अंग्रेजी
हिंदी लिबास को छोड़ दिया
सब दीख रहे हैं अंग्रेजी
यह आज प्रतिष्ठा सूचक हैं
हम अंग्रेजी में बात करें
हिंदी है पिछड़ों की भाषा
ना हिंदी-भाषी साथ रखें
क़ानून समूचा अंग्रेजी
शिक्षा में छाई अंग्रेजी
चाहे हिंदी अध्यापक हो
उसको भी भाई अंग्रेजी
अपनी भाषा कहते हैं तो
हिंदी को मान दिलाना है
बस नाम नहीं देना केवल
सच्चा सम्मान दिलाना है
भारत में जब हर कागज़ पर
हिंदी में लिक्खा जाएगा
उस दिन ही हर भारतवासी
हाँ हिंदी दिवस मनाएगा
आँखों में आँसू मत रखना
करने की अभिलाषा रखना
निज क़लम और अधरों पर बस
केवल हिंदी भाषा रखना
फिर से आवाज़ लगाता हूँ
नवयुग की आशा हो हिंदी
बस केवल यही पुकार मेरी
जन-जन की भाषा हो हिंदी