Bihari

बिहारी / Bihari

बिहारी लाल के पचीस दोहे

कोऊ कोरिक संग्रहौ कोऊ लाख हजार।
मो सम्पति जदुपति सदा बिपति-बिदारनहार॥

ज्यौं ह्वैहौं त्यौं होऊँगौ हौं हरि अपनी चाल।
हठु न करौ अति कठिनु है मो तारिबो गुपाल॥

करौ कुबत जगु कुटिलता तजौं न दीनदयाल।
दुखी होहुगे सरल चित बसत त्रिभंगीलाल॥

मोहिं तुम्हैं बाढ़ी बहस को जीतै जदुराज।
अपनैं-अपनैं बिरद की दुहूँ निबाहन लाज॥

निज करनी सकुचें हिं कत सकुचावत इहिं चाल।
मोहूँ-से अति बिमुख त्यौं सनमुख रहि गोपाल॥

तौ अनेक औगुन भरी चाहै याहि बलाइ।
जौ पति सम्पति हूँ बिना जदुपति राखे जाइ॥

हरि कीजति बिनती यहै तुमसौं बार हजार।
जिहिं तिहिं भाँति डर्‌यौ रह्यौ पर्‌यौ रहौं दरबार॥

तौ बलियै भलियै बनी नागर नन्दकिसोर।
जौ तुम नीकैं कै लख्यौ मो करनी की ओर॥

समै पलटि पलटै प्रकृति को न तजै निज चाल।
भौ अकरुन करुना करौ इहिं कुपूत कलिकाल॥ अपनैं-अपनैं मत लगे बादि मचावत सोरु।
ज्यौं-त्यौं सबकौं सेइबौ एकै नन्दकिसोरु॥

अरुन सरोरुह कर-चरन दृग-खंजन मुख चंद।
समै आइ सुन्दरि सरद काहि न करति अनंद॥

ओछे बड़े न ह्वै सकैं लगौ सतर ह्वै गैन।
दीरघ होहिं न नैकहूँ फारि निहारैं नैन॥

औरैं गति औरै बचन भयौ बदन-रँगु औरु।
द्यौसक तैं पिय-चित चढ़ी कहैं चढ़ैं हूँ त्यौरु॥

गाढ़ैं ठाढ़ैं कुचनु ठिलि पिय-हिय को ठहराइ।
उकसौंहैं हीं तौ हियैं दई सबै उकसाइ॥

गुरुजन दूजैं ब्याह कौं निसि दिन रहत रिसाइ।
पति की पति राखति बधू आपुन बाँझ कहाइ॥

घर-घर तुरुकनि हिन्दुअनि देतिं असीस सराहि।
पतिनु राखि चादर-चुरी तैं राखीं जयसाहि॥

जनमु जलधि पानिप बिमलु भौ जग आघु अपारु।
रहै गुनी ह्वै गर पर्यौ भलैं न मुकुताहारु॥

पावस कठिन जु पीर, अबला क्यौंकरि सहि सकैं।
तेऊ धरत न धीर, रक्त-बीज सम ऊपजै॥

प्यासे दुपहर जेठ के फिरै सबै जलु सोधि।
मरुधर पाइ मतीर हीं मारू कहत पयोधि॥

समै-समै सुन्दर सबै रूपु-कुरूपु न कोइ।
मन की रुचि जेती जितै तित तेती रुचि होइ॥

सामाँ सेन सयान की सबै साहि कैं साथ।
बाहु-बली जयसाहि जू फते तिहारैं हाथ॥

काल्हि दसहरा बीति है धरि मूरखजिय लाज।
दुर्‌यौ फिरत कत द्रुमनु मैं नीलकंठ बिनु काज॥

हुकुम पाइ जयसाहि कौ हरि-राधिका-प्रसाद।
करी बिहारी सतसई भरी अनेक सवाद॥

संबत ग्रह ससि जलधि छिति छठ तिथि बासर चंद।
चैत मास पछ कृष्ण में पूरन आनँदकंद॥

सतसैया कै दोहरे अरु नावकु कै तीरु।
देखत तौ छोटैं लगैं घाव करैं गंभीरु॥ गाहि सरोवर सौरभ लै, ततकाल खिले जलजातन मैं कै।
नीठि चलै जल वास अचै, लपटाइ लता तरु मारग मैं कै।
पोंछत सीतन तैं श्रम स्वेदंन, खेद हटैं सब राति रमै कै।
आवत जाति झरोखनि कैं मग, सीतल बात प्रभात समै कै।।

है यह आजु बसन्त समौ, सु भरौसो न काहुहि कान्ह के जी कौ
अंध कै गंध बढ़ाय लै जात है, मंजुल मारुत कुंज गली कौ
कैसेहुँ भोर मुठी मैं पर्यौ, समुझैं रहियौ न छुट्यौ नहिं नीकौ
देखति बेलि उतैं बिगसी, इत हौ बिगस्यौ बन बौलसरी कौं।।

बौरसरी मधुपान छक्यौ, मकरन्द भरे अरविन्द जु न्हायौ
माधुरी कुंज सौं खाइ धका, परि केतकि पाँडर कै उठि धायौ
सौनजुही मँडराय रह्यौ, बिनु संग लिए मधुपावलि गायौ
चंपहि चूरि गुलाबहिं गाहि, समीर चमेलिहि चूँवति आयौ।।

जाके लिए घर आई घिघाय, करी मनुहारि उती तुम गाढ़ी
आजु लखैं उहिं जात उतै, न रही सुरत्यौ उर यौं रति बाढ़ी
ता छिन तैं तिहिं भाँति अजौं, न हलै न चलै बिधि की लसी काढ़ी
वाहि गँवा छिनु वाही गली तिनु, वैसैहीं चाह (बै) वैसेही ठाढ़ी ।। खेलत फाग दुहूँ तिय कौ मन राखिबै कौ कियौ दाँव नवीनौ
प्यार जनाय घरैंनु सौं लै, भरि मूँठि गुलाल दुहूँ दृग दीनौ
लोचन मीडै उतै उत बेसु, इतै मैं मनोरथ पूरन कीनौ
नागर नैंक नवोढ़ त्रिया, उर लाय चटाक दै चूँबन लीनौ।

नील पर कटि तट जटनि दै मेरी आली,
लटुन सी साँवरी रजनि सरसान दै,
नूपुर उतारन किंकनी खोल डारनि दै
धारन दै भूषन कपूर पान खान दै,
सरस सिंगार कै बिहारी लालै बसि करौ
बसि न करि सकै ज्यौं आन प्रिय प्रान दै,
तौ लगि तू धीर धर एतौ मेरौ कह्यौ करि
चलिहौं कन्हैया पै जुन्हैया नैंकु जानि दै।। केसरि से बरन सुबरन बरन जीत्यौ
बरनीं न जाइ अवरन बै गई।
कहत बिहारी सुठि सरस पयूष हू तैं,
उष हू तैं मीठै बैनन बितै गई।
भौंहिनि नचाइ मृदु मुसिकाइ दावभाव
चचंल चलाप चब चेरी चितै कै गई।
लीने कर बेली अलबेली सु अकेली तिय
जाबन कौं आई जिय जावन सौं दे गई।।

जानत नहिं लगि मैं मानिहौं बिलगि कहै
तुम तौ बधात ही तै वहै नाँध नाध्यौ है।
लीजिये न छेहु निरगुन सौं न होइ नेहु
परबस देहु गेहु ये ही सुख साँध्यौ है।
गोकुल के लोग पैं गुपाल न बिसार्यौ जाइ
रावरे कहे तौ क्यौं हूँ जोगो काँध काँध्यौ है।
कीजिए न रारि ऊधौ देखिये विचारि काहु
हीरा छोड़ि डारि कै कसीरा गाँठि बाँध्यौ है।।

वंस बड़ौ बड़ी संगति पाइ, बड़ाई बड़ी खरी यौ जग झेली।
साँप फुकारन सीस रसारनु है सबसे जिय ऊपर खेली।
बाइक एक ही बार उजारि कै मारि सबै ब्रज नारि नवेली।
मोहन संग तू लै जसुरी, बसु (री) बँसुरी ब्रज आइ अकेली।। सौंह कियें ढरकौहे से नैन, टकी न टटै हिलकी हलियै।
मुँह आगै हू आये न सूझयौ कछू ,सु कहयौ कछु ये सुति साँभल ए।
भौर ते साँझि भई न अजौं, घरि भतिर बाहर कौ ढलिए।
रहे गेह की देहरी ठाढ़े दोऊ, उर लागी दुहून चलौ चलिए।।

हो झालौ दे छे रसिया नागर पनाँ।
साराँ देखे लाज मराँ छाँ आवाँ किण जतनाँ॥
छैल अनोखो कह्यो न मानै लोभी रूप सनाँ।
रसिक बिहारी नणद बुरी छै हो लाग्यो म्हारो मनाँ॥

पावस रितु बृन्दावनकी दुति दिन-दिन दूनी दरसै है।
छबि सरसै है लूमझूम यो सावन घन घन बरसै है॥१॥
हरिया तरवर सरवर भरिया जमुना नीर कलोलै है।
मन मोलै है, बागोंमें मोर सुहावणो बोलै है॥२॥
आभा माहीं बिजली चमकै जलधर गहरो गाजै है।
रितु राजै है, स्यामकी सुंदर मुरली बाजै है॥३॥
(रसिक) बिहारीजी रो भीज्यो पीतांबर प्यारीजी री चूनर सारी है।
सुखकारी है, कुंजाँ झूल रह्या पिय प्यारी है॥४॥ बिरहानल दाह दहै तन ताप, करी बड़वानल ज्वाल रदी।
घर तैं लखि चन्द्रमुखीन चली, चलि माह अन्हान कछू जु सदी।
पहिलैं ही सहेलनि तैं सबके, बरजें हसि घाइ घसौ अबदी।
परस्यौ कर जाइ न न्हाय सु कौन, री अंग लगे उफनान नदी।।

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ।
प्रेम छकी रसबस अलसाड़ी, जाणे कमलकी पाँखड़ियाँ॥
सुंदर रूप लुभाई गति मति, हो गईं ज्यूँ मधु माँखड़ियाँ।
रसिक बिहारी वारी प्यारी, कौन बसी निस काँखड़ियाँ॥

मैं अपनौ मनभावन लीनों॥
इन लोगनको कहा कीनों मन दै मोल लियो री सजनी।
रत्न अमोलक नंददुलारो नवल लाल रंग भीनों॥
कहा भयो सबके मुख मोरे मैं पायो पीव प्रवीनों।
रसिक बिहारी प्यारो प्रीतम सिर बिधना लिख दीनों॥

उड़ि गुलाल घूँघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान॥
फूलनके सिर सेहरा, फाग रंग रँगे बेस।
भाँवरहीमें दौड़ते, लै गति सुलभ सुदेस॥
भीण्यो केसर रंगसूँ लगे अरुन पट पीत।
डालै चाँचा चौकमें गहि बहियाँ दोउ मीत॥
रच्यौ रँगीली रैनमें, होरीके बिच ब्याह।
बनी बिहारन रसमयी रसिक बिहारी नाह॥