छोटा कदम

लेखक:- नजमुन नवी खाँ "नाज़"

अक्सर ही हम ऐसा सुनते है और ज्यादातर व्यक्ति अपने मन में ऐसा भाव रखते है कि हम आखिर अपने समाज और देश के लिये क्या कर सकते हैं। हम तो अपनी और अपने परिवार के सदस्यांे की जरूरतों को ही पूरा कर लंे तो बहुत बड़ी बात होगी ! हमारे सवालों का जवाब हमंे अपने परिवेश से ही मिलेगा अपने आस-पास की गगनचुम्बी इमारतों को देखें क्या ये एक मंे इतनी विशालता को पायी नहीं इनकी भी शुरूआत एक छोटी सी ईट से हुयी, काल चक्र (सह्स्त्राब्दी) भी वर्षों से वर्ष महीनांे से महीने, दिनांे से दिन, घन्टांे से घन्टे, मिनटों से मिनट, सेकेन्डों से मिलकर बनते हैं। राशि कितनी भी बड़ी हो लेकिन बनती है पैसांे के आपस मे जुड़ने से ही, दुनिया भी बनती है तो मोहल्ला, शहर, जिला, प्रदेश, देशांे के संयोजन से ही। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे सम्मुख मौजूद हैं इन सभी उदाहरणांे से यह निष्कर्ष निकलता है कि छोटी सी शुरूआत ही बड़ा परिणाम देती है। हमारा सही दिशा में उठाया गया एक छोटा सा कदम भी देश और समाज के उत्थान मंे एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। जरूरी नहीं है कि करोड़ांे का या लाखांे का दान देकर ही समाज के विकास में अपना योगदान दिया जाय। हम अपने सामर्थ के अनुसार ही ऐसा कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर हम अपने पास पड़ोस के गरीब असमर्थ बच्चों को पेन्सिल, पेन, रबर, किताबें, नोट्बुक या अन्य स्टेशनरी को दान देकर उनकी शिक्षा प्राप्ति में अपना योगदान कर सकते हैं तथा अपने खाली समय मे हम निर्धन बच्चे जो ट्यूशन फीस देने मे असमर्थ हैं। उनको शिक्षादान यानि पढ़ा कर राष्ट्र निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं। क्यांेकि शिक्षा ही वह मार्ग है जिस पर चल कर हर तरह की समस्याओं का डट कर मुकाबला किया जा सकता है शिक्षा मानव को हर तरह के बन्धन चाहे वो जातीयता, क्षेत्रीयता भाषा या अन्य कोई हो सभी से मुक्ति दिलाती है।
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