धर्म

लेखक:- नजमुन नवी खाँ "नाज़"

‘धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं।’ ‘नर ही नारायण है।’ आज के दौर में ये वाक्य खो से गये लगते हैं। ‘अधर्म का नाश हो’ ये वाक्य धर्म के ठेकेदारों के द्वारा कहा जाता है लेकिन अधर्म कि वास्तविक परिभाषा को वो बदल दे रहे हैं। अधर्म का अर्थ है धर्म के विपरीत किया गया कार्य। धर्म का अर्थ है सच्चाई, मेहनत, ईमानदारी, दुव्र्यसनों से दूर रहकर जीवन व्यतीत करना। आज धर्म के ठेकेदार दूसरे धर्मों को अधर्म की परिभाषा देते हैं। धर्म के ठेकेदार लक्सरी वाहनों में रक्षक लेकर चलते हैं। सच्चा भक्त ईश्वर पर विश्वास रखता है। वो जानता है ईश्वर की मर्जी के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता। उनको मौत का डर नहीं सताता है। आप अगर अच्छे हैं तो स्वतः ही जनता आपसे जुड़ेगी। ‘भूखे पेट न होई भजन गोपाला’ जनता का पेट रोटी से भरेगा न कि धार्मिक स्थल बनने से। ईश्वर तो दिलों में बसता है। धर्म के ठेकेदार जनता को साक्षर नहीं होने देना चाहते। साक्षरता अन्धकार को दूर भगाती है अगर जनता जाग गयी तो ऐसे लोगों का अस्तित्व खत्म हो जायेगा।
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