अब्दुल हमीद / Abdul Hameed

अब्दुल हमीद / Abdul Hameed

अजीब शय है के सूरत बदलती जाती है

अजीब शय है के सूरत बदलती जाती है
ये शाम जैसे मक़ाबिर में ढलती जाती है

चहार सम्त से तेशा-ज़नी हवा की है
ये शाख़-ए-सब्ज़ के हर आन फलती जाती है

पहुँच सकूँगा फ़सील-ए-बुलंद तक कैसे
के मेरे हाथ से रस्सी फिसलती जाती है

कहीं से आती ही जाती है नींद आँखों में
किसी के आने की साअत निकलती जाती है

निगह को ज़ाएक़ा-ए-ख़ाक मिलने वाला है
के साहिलों की तरफ़ नाव चलती जाती है

दिल में जो बात है बताते नहीं

दिल में जो बात है बताते नहीं
दूर तक हम कहीं भी जाते नहीं

अक्स कुछ देर तक नहीं रुकते
बोझ ये आईने उठाते नहीं

ये नसीहत भी लोग करने लगे
इस तरह मुफ़्त दिल गँवाते नहीं

दूर बस्ती पे है धुवाँ कब से
क्या जला है जिसे बुझाते नहीं

छोड़ देते हैं इक शरर बे-नाम
आग लग जाती है लगाते नहीं

भूल जाना भी अब नहीं आसाँ
वरना ये ख़िफ़्फ़तें उठाते नहीं

आप अपने में जलते बुझते हैं
ये तमाशा कहीं दिखाते नहीं

एक ख़ुदा पर तकिया कर के बैठ गए हैं

एक ख़ुदा पर तकिया कर के बैठ गए हैं
देखो हम भी क्या क्या कर के बैठ गए हैं

पूछ रहे हैं लोग अरे वो शख़्स कहाँ है
जाने कौन तमाशा कर के बैठ गए हैं

उतरे थे मैदान में सब कुछ ठीक करेंगे
सब कुछ उल्टा सीधा कर के बैठ गए हैं

सारे शजर शादाबी समेटे अपनी अपनी
धूप में गहरा साया कर के बैठ गए हैं

लौट गए सब सोच के घर में कोई नहीं है
और ये हम के अँधेरा कर के बैठ गए हैं

एक मिशअल थी बुझा दी उस ने

एक मिशअल थी बुझा दी उस ने
फिर अँधेरों को हवा दी उस ने

किस क़दर फ़र्त-ए-अक़ीदत से झुका
और फिर ख़ाक उड़ा दी उस ने

दम-ब-दम मुझ पे चला कर तलवार
एक पत्थर को जिला दी उस ने

याँ तो आता ही नहीं था कोई
आन कर बज़्म सजा दी उस ने

कभी देखो तो मौजों का तड़पना

कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता है
ये दरिया इतना पानी पी के प्यासा कैसा लगता है

हम उस से थोड़ी दूरी पर हमेशा रुक से जाते हैं
न जाने उस से मिलने का इरादा कैसा लगता है

मैं धीरे धीरे उन का दुश्मन-ए-जाँ बनता जाता हूँ
वो आँखें कितनी क़ातिल हैं वो चेहरा कैसा लगता है

ज़वाल-ए-जिस्म को देखो तो कुछ एहसास हो इस का
बिखरता ज़र्रा ज़र्रा कोई सहरा कैसा लगता है

फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं
हवा कहती है मुझ से ये तमाशा कैसा लगता है

ख़ाक बसर ले आई है

ख़ाक बसर ले आई है
राह किधर ले आई है

लिख के परों पर इक तितली
उस की ख़बर ले आई है

कितने सितारे ख़्वाबों के
गर्द-ए-सफ़र ले आई है

राज़ कोई इन आँखों का
शफ़क़-ए-सहर ले आई है

एक हवा कितनी यादें
मेरे घर ले आई है

किसी दश्त ओ दर से

किसी दश्त ओ दर से गुज़रना भी क्या
हुए ख़ाक जब तो बिखरना भी क्या

वही इक समंदर वही इक हवा
मेरी शाम तेरा सँवरना भी क्या

लकीरों के हैं खेल सब ज़ाविए
इधर से उधर पाँव धरना भी क्या

मुझे ऊब सी सब से होने लगी
ये जीना भी क्या और मरना भी क्या

अगर उन से बच कर निकल जाइए
तो फिर उस की आँखों से डरना भी क्या

घने जंगलों की बुझी कैसे आग
कहीं पास था कोई झरना भी क्या

किसी तरह से उस का घर तो मिला
मगर अब मुलाक़ात करना भी क्या

किसी का क़हर किसी की दुआ

किसी का क़हर किसी की दुआ मिले तो सही
सही वो दुश्मन-ए-जाँ-आशना मिले तो सही

अभी तो लाल हरी बत्तियों को देखते हैं
मिले किसी की ख़बर सिलसिला मिले तो सही

ये क़ैद है तो रिहाई भी अब ज़रूरी है
किसी भी सम्त कोई रास्ता मिले तो सही

ये शाम-ए-सर्द में हर सू अलाव जलते हैं
सियह ख़ामोशी में कोई सदा मिले तो सही

क़बा-ए-जिस्म के है तार तार नज़र करें
कभी कहीं वही पागल हवा मिले तो सही