jyoti

ज्योति सोनम नामदेव /Jyoti Sonam Namdev

ज्योति सोनम नामदेव /Jyoti Sonam Namdev

बंद कर बहाना आँखों से पानी

क्या कहूं, कैसे कहूं, नारी तेरा बखान
आज तक तू खुद ही है, अपने
से अनजान
कस्तूरी मृग जैसे ढूंढता है, अपनी सुगंध
पगला घूमे, देख-फिरे वन में स्वछंद
ऐसे ही तू भी अपनी शक्तियों से नहीं परिचित,
छली जाती है, ठगी जाती है, पग-पग पर इसलिए निश्चित,
जरा गौर से देख अपनी तरफ नहीं किसी से कम,
चाहे हो उजला सवेरा, चाहे घनघोर हो तम l
नदियों के जल को जहाँ रोज है पूजा जाता,
वहाँ हर रोज गंगा सी काया को निर्मम बेचा जाता l
तू मानवी है अखंडित,
जिसके खंड -खंड होकर भी संगठित l
अब न कोई मानव, जो तुझे बचा पाएं
मत ताक इधर -उधर बस यूँ ही तू छली जाएँ l
कैसे मुर्ख प्राणी है इस समाज में बसते,
गंगाघाट पर रहकर भी गंगा स्नान से तरसते l
तू अगम, सुगम अपने को पहचान,
तू होंगी तभी तो होंगे, इस समाज में प्राण l
कुदरत की सबसे सुन्दर कृति है तू,
सद्गुणो की पुंज शक्ति है तू
हा !हा ! हा !मत कर नाद
उठ हे देवी कर शोषण का विनाश
बनना छोड़ अब तू रसिको की रसिका,
अपने पैरो पर खड़ी होकर चला अपनी जीविका l
डंके की चोट पर बोल अब तू जननी,
शोधक है तू, मत भोजक मत बन री l
धूं -धूं करते नाच रहे है, सतीत्व का तांडव नृत्य,
तू क्यों सोचे इतना, तुझपर अपने ही करे घोर कृत्य l
मत बन दुख का बादल जो आज उमडे कल मिट चले,
तू काल बन उन अपराधियों का, जो तेरी अस्मिता से खेले फिर चलते बने l
तू रीत नहीं जो निभाई जाएं,
तू बांसुरी नहीं जो बजाई जाएं,
तू वस्तु नहीं जो भोगी जाएं,
तू नशा नहीं जो पिया जाएं,
तू प्रकृति है दया निधे !
तू शक्तियों का भंडार है दुर्गे,
तू नदियों का बहता जल गंगा,
तू वृक्ष -स्थल से बहता दूध है ममता,
तू अनंत, अगम्य, रागिनी सी बजती,
उपमान भी फीके पड़े, जब तू गरजती l
अब तू रच एक कठोर कहानी,
बंद कर बहाना आँखों से पानी,
बंद कर बहाना आँखों से पानी l
क्या कहूं, कैसे कहूं, नारी तेरा बखान,
आज तक तू खुद ही है अपने से अंजान,
आज तक तू खुद ही है अपने से अंजान

मित्रता

एक दिवस की बात,
चारो तरफ संग्राम
, संग्राम मे दोनों तरफ
की, सेना निरंतर थी लड़ रही.


तभी मधु सूदन को ऊँगली
मे चोट लगी,
बह निकली रक्त की धार,
द्रोपदी ने देखा तो,
हुई द्रवित ह्रदय सार l

ना उधर देखा, ना इधर देखा,
झट फाड़ा अपना अंग वस्त्र,
एक टुकड़े बस उस अम्बर के,
बांधा उसने पूरे विश्व को l


देखा द्वारकाधीश ने
तो बोले.. हे सखी
ये क्या किया तुमने?
क्यों फाड़ा तुमने इस चीर
को? सखी परेशान ना हो,
कुछ ना होगा इस वीर को l

द्रोपदी बोली.. शांत रहिए मधु सूदन
जानती हू, आप है इस जगत के जीवन,
लेकिन सामने बहती धार ये कैसे देखु,
जो सबके जीवन के आधार
उसका ही रक्त बहे, ये कैसे देखु l


छोड़ो सखी... चिंता ना करो अब,
बांध लिया तुमने ऋण मुझे अब,
समय साथ देगा तो बताना है ऐसा,.
कि मित्रता भाव होता है कैसा l

समय चक्र बड़ा,
काल का पहिया चला,
चौरस व्यूह मे शैतानी जंग,
हार गए सब कुछ कौरवो से, पांडव बस रह गए दंग l


भुकुटी तनी थी, दुर्योधन की
विनाश काले विपरीत बुद्धि,
अन्धकार मय सारा हस्तिनापुर,
अंतर्मन बिलख-बिलखकर रो रहा मन l


मौके का फायदा उठा,
केश पकड़ते खींचता दुशाशन,
द्रोपदी को धरती पर खिचड़ते चला,
हाय हाय ये क्या हो रहा,
इस धरती पर स्त्री का,
चीर हरण हो रहा l


हा हा हा हॅसते कौरव,
इस भयानक कृत्य पर,
प्रसन्न चित होते कौरव,
लगा खींचने दुशाशन
द्रोपदी की साडी
हाय हाय हस्तिनापुर आज
तुझे क्या लाज नहीं आई?


थी सभा सन्न,
सबके मुख थे सिले हुए,
क्या पांडव, क्या भीष्म,
क्या बड़े, क्या छोटे,
धरती मे जैसे पग थे
गढ़े हुए l

जैसे ही द्रोपदी ने कृष्णा का
आवाहन किया,
उसे द्रवित ह्रदय से पुकारा,
उसको तो आना ही पड़ा l


दुशाशन खींचता चला, खींचता चला,
खींचता चला,
पर ये क्या?
साड़ी है या अनंत आकाश
जो कभी खत्म न हुआ l


धराशायी हुआ दुशाशन,
नीची दृष्टि गढ़ा दुर्योधन,
आज सती को चले लूटने,
उनका ही टूटा अभिमान l

जिसकी रक्षा की सौगंध ली
थी पांडवो ने
उसकी रक्षा की निश्छल
मित्रता ने


मित्रता एक भाव
प्रेम का,
मित्रता नाम है
सुन्दर मन का l

प्रसंग नहीं
ये सत्य है
निर्लज्जो की हुई हार
ये शाश्वत सत्य है

फूल

फूल की है, मुस्कान पुलकित
फूल की है, मुस्कान पुलकित
चारो तरफ फ़ैली पंखुणियाँ कॉमन ।
आकार आधार जितना भी तेरा
सुन्दर पवित्र और सुगन्धित
काँटों का दामन भी तेरा
सुख दुःख भी है आँगन तेरा
फिर भी खुशबू ही बिखेरता है चारो तरफ
क्यों तुझमे नफरत ना आई
क्यों तूने भी रंग ना बदला
तुझे जमाने के साथ जीना नहीं है क्या ?
यहाँ तो बिना रंग बदले जीवन ही नहीं है जैसे
तो फिर तू कैसे जी रहा है ,
राज तो खोल, कुछ तो बोल
नहीं तो बंद कर अच्छा बनने का दिखावा
फूल बोला- बोल दू तो बात ही क्या
तू तो मानव है, चेतन दिमाग पाया है तुमने
सोच समझ अपने आप अगर तुझे भी बताना पड़े मुझे,
तो तेरे मानव होने का मतलब ही क्या

माँ भारती अब आजाद हो गयी

माँ भारती अब आजाद हो गयी
माँ भारती
तू भी अब आधुनिक हो गयी
क्या सही मायने में आजाद हो गयी
परिभाषा तेरी आजादी की
बौद्धिक लोगो ने नए नए रूपों में गढ़ी है
मन की तू अब बोलती है
सारे राज परत दर परत खोलती है
लेकिन तेरे बोलने का दबदबा है क्या
या तेरे लाल सिर्फ तुझे सुनने का बहाना करते है
भारत माता की जय बोलते बोलते
कब अपने स्वार्थो की जय बोलते है
और वो भी कितनी सफाई से
पता ही नहीं चलता
माँ भारती तेरा दामन
शेरो से कम गिरगीटो से ज्यादा भरा है
बात बात पर रंग बदलते है
माँ भारती
तू भी अब आधुनिक हो गयी
क्या सही मायने में आजाद हो गयी
आजादी का मतलब भारत में
खुलकर तिजोरिया भरने से है
आजादी का मतलब भारत में
बेटियों की आबरू से खेलने से है
आजादी का मतलब भारत में
बहु बेटियों की आवाज दबाने से है
आजादी का मतलब भारत में
नेताओ द्वारा मानवाधिकारों को कुचलने से है
आजादी का मतलब भारत में
धर्म जाती के आधार पर लड़ने से है
अरे चलो छोडो सब
एक बार फिर से ताली बजाते है
मानते है आजादी का जश्न
जोर शोर से बोलते है वन्दे मातरम
क्योकि हम आजाद है हम आजाद है हम आजाद है

उम्र

ऐ उम्र रुक जा, थम जा, अभी बहुत कुछ है
बाकी करने को
चाल धीमी तो कर अपनी,
पता नहीं तुझे इतनी जल्दी ही क्या है
हूँ तो तेरे साथ, चलने का मजा तो ले धीरे धीरे
ठहराव तो ले, पड़ाव तो ले,
क्यों तू बेसुध जी भागे जा रही है
अपनी ही बेखुदी में, मुझे भी भगाये ले जा रही है

जियूँ तो कैसे जियूँ

बोले जरा सोचो....
जियूँ तो कैसे जियूँ
किसे से खुलकर जो बात कर लो
तो बेशर्मी कहलाती है
चुप बैठु अपने में ही
तो अकड़ू कहलाता है
सीधेपन रहो
तो फूहड़पन कहलाता है
बोलो जरा सोचो
जियूँ तो कैसे जियूँ
विचार रखो तो तुम्हे ही ज्यादा अक्ल है
ताना मिलता है
ना रखो तो संगिनी अच्छी नहीं मिली
उलाहना मिलता है
बहस करो तो गाली गलौच यहाँ तक
मार पीट तक बात आ जाती है
बोलो जरा सोचो
जियूँ तो कैसे जियूँ
ए पुरूष तुझे संगिनी नहीं
गुड़िया चाहिए
मन चाहा तब खेला
वरना एक तरफ सरका दिया
सबसे पहले तेरे अहम को चोटिल लगती है
तेरा अहम ही बड़ा चोटिल है
बोले जरा सोचो....
जियूँ तो कैसे जियूँ

जिंदगी क्या है ?

जिंदगी क्या है ?
खुली आँखों के स्वप्न का ताना बाना और कुछ नहीं
मौत क्या है ?
हमारा सबसे बड़ा मीत, मुँह जबानी, एक हत्वा बाकी कुछ नहीं
प्यार क्या है ?
किसी के साथ जीने की चाहत, एक तड़पन बाकी कुछ नहीं
घृणा क्या है ?
कुछ ना मिलने की तीखी भावना, बाकी कुछ नहीं
आदमी क्या है ?
पानी का एक बुलबुला, जो जाने कब फूट जाए बाकी कुछ नहीं
दौलत क्या है ?
जीविका चलाने का जरिया , कुछ कागज के टुकड़े बाकी कुछ नहीं
शौहरत क्या है ?
कुछ दिनों की रौनक, खुशनुमा पल बाकी कुछ नहीं
मजहब क्या है ?
अदृश्य शक्ति को पाने की लालसा बाकी कुछ नहीं
कुछ चाँद टुकड़ो की खातिर नष्ट कर रहा इस जीवन को
जाग जीवन अमूल्य धन है बाकी कुछ नहीं

याचना

ए मेरे मन की देवी पर आधारित
मेरे कल्पना के देव
मेरे कानन जीवन में
खिले अधखिले पुष्पः बेला
कृतिका सहहयता की
सत्यम शिवम् सुंदरम के अस्तित्व की
बैष्णो के मुक्तिकरण की
आज अपने ही मन को टटोलने का प्रयास
दया दृष्टि हो मुझ पर
दूर तुम करो मन का अँधियारा
परिवरतीत कर दो उजाले में
प्रतिभूत होकर रोशन
अब धुंधले स्वप्न भी मेरे
लालायित हो उठे झूम झूम कर
जिसमे ये अवनी अम्बर

अगर सिर्फ पानी से ही प्यास बुझती

अगर सिर्फ पानी से ही प्यास बुझती ,
तो नदियों को धरा पर यूं बहना ना पडता
बचपन से बुढ़ापे तक, जन्म से मरण तक
कुछ ना कुछ सीखता है मानव
अगर सिर्फ किताबों से ज्ञान मिलता
तो प्रकृति को हमें सिखाना ना पड़ता
अगर सिर्फ पानी से ही प्यास बुझती ,
तो नदियों को धरा पर यूं बहना ना पडता
कहते है कर्मो से ही हम बनते बिगड़ते है
सब असत्य है यह
अगर ये सच होता तो
मृत्यु उपरान्त इस देह को यूं जलाना ना पड़ता
अगर सिर्फ पानी से ही प्यास बुझती ,
तो नदियों को धरा पर यूं बहना ना पडता
किनारो की तमन्ना लहरो से मिलने की है
घड़े की तमन्ना पूरा जल पी लेने की है
आत्मा की तमन्ना परमात्मा से मिलने की है
अगर सिर्फ मंदिर मे जाने से ईश्वर मिल जाता
तो मानव को यूं दर दर भटकना ना पड़ता
अगर सिर्फ पानी से ही प्यास बुझती ,
तो नदियों को धरा पर यूं बहना ना पडता

भाव

भाव
जीवन रंगों और भावों का मिला जुला एक गुलदस्ता है
जो हमेशा हर पल महकता ही रहता है
और कुछ ना कुछ हमें देता रहता ही है हमें
इसमें फूल भी है, शूल भी है भूल भी है
इसमें जाल भी है काल भी है
इसमें कीचड़ भी है, चन्दन है सुंदरता है
इसमें प्रेम भी है, घृणा है त्याग है
इसमें वात्सल्य भी है और प्रौढ़ता भी है
इसमें रस भी है आनद भी है
इसमें चंचलता भी है चपलता भी है
इसमें कर्तव्य भी है सज्जनता भी है
आदमी यही बनता है यही बिगड़ता है
कोई भी इसके आँचल से अपने आपको
बाहर नहीं कर पाया आज तक
कभी सोचा है

सपना

एक रात मेरा अजीज सपना
सपने में, मैं बहुत अचंभित
एक तरफ मेरा बचपन था
एक सावली शक्ल, घुंघराले बालो वाली
एक लड़की मुझे बुला रही थी
दूसरी तरफ मेरा बुढ़ापा
जो बड़ी विचित्र निगाहो से मेरी तरफ देख रहा था
एक बूढ़ी स्त्री जो बोलीं जरा मेरे पास
तो आकर बैठो
एक तरफ एक तितली
जिसको पकड़ने के लिए दिल मचलता है
कोमल कोयल सी तुतलाती आवाज़
दूसरी तरफ जिसको आभास करना भी भयावह
दर्द सी भरी भारी आवाज़
एक तरफ झूमती हवा गाती जीवन की लहरे
मचलता हुआ कोमल शरीर
दूसरी तरफ सब कुछ रूका हुआ
थका हुआ न मचलता न लहरे
केवल शांति
एक तरफ कोमल त्वचा
दूसरी तरफ झुर्रियों का अनुभव
लेकिन अचानक क्या दोनों उठी
मेरी बांह पकड़कर खींचने लगी बारम्बार
खुली मेरी आँखे और में बिस्तर पर थी
लेकिन तीनो लोको का भ्रमण और सीख मिल गयी मुझे