Kavita Kiran

कविता किरण / Kavita Kiran

वो लड़की सोलह(१६) साल की

अभी अभी जो खेल के आई हाथी घोडा पालकी
अभी अभी जो खेल के आई हाथी घोडा पालकी
अब भी मेरे अन्दर है वो लड़की सोलह(१६) साल की
जिसको भाति बहुत कहानी विक्रम और बेताल की
अब भी मेरे अन्दर है वो लड़की सोलह(१६) साल की
(लड़कियों के लिए बहुत प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं)
जिसको खट्टी इमली अम्मियाँ खाने से अम्मा रोके
जान बूझकर जिसको छूकर निकले बासंती झोंके
जिसको खुलकर हँसने पर हर दम दादा दादी टोके
जिसको देहरी से बाहर जाने के मिलते कम मौके
तन्हाई में ऐसे तडपे जैसे मछली जाल की
तन्हाई में ऐसे तडपे जैसे मछली जाल की
अब भी मेरे अन्दर है वो लड़की सोलह(१६) साल की
जिसको एक दीवाना आधी रातों को ख़त लिखता है
जिसका फोटू वो हरदम अपने बटुए में रखता है
भंवरो का दल जिस कलि के खिलने का रास्ता तकता है
जिसकी एक झलक को पहरों चाँद गगन में जकता है
चौराहों पर चर्चा जिसकी हिरनी जैसी चाल की
अब भी मेरे अन्दर है वो लड़की सोलह(१६) साल की
जिसकी देह में दिवाली है और आँखों में रंगोली
तितली पकडे बाघों में जो भवरों के पीछे डोली
बहार से तो चतुर बने लेकिन है भीतर से भोली
जो बातों ही बातों में अनजाने साजन की होली
समझ नहीं है अब तक जिसको योवन के सुर ताल की
अब भी मेरे अन्दर है वो लड़की सोलह(१६) साल की
अब भी मेरे अन्दर है वो लड़की सोलह(१६) साल की
जिसमे थोडा तीखापन है और थोडा सा भोलापन
आधा बचपन छलके जिसमे और छलके आधा योवन
जिसके रूप के आगे झुक जाती है शाहों की गर्दन
जिसने खुद तो तक तक तोड़ दिए घर के सारे दर्पण
कभी अकड़ है पर्वत की तो कभी लचक है डाल की
अब भी मेरे अन्दर है वो लड़की सोलह(१६) साल की
अभी अभी जो खेल के आई हाथी घोडा पालकी
अब भी मेरे अन्दर है वो लड़की सोलह(१६) साल की

समंदर को सफ़ीना कर लिया

है समंदर को सफ़ीना कर लिया
हमने यूँ आसान जीना कर लिया

अब नहीं है दूर मंजिल सोचकर
साफ़ माथे का पसीना कर लिया

जीस्त के तपते झुलसते जेठ को
रो के सावन का महीना कर लिया

आपने अपना बनाकर हमसफ़र
एक कंकर को नगीना कर लिया

हँस के नादानों के पत्थर खा लिए
घर को ही मक्का मदीना कर लिया

निकला करो इधर से भी होकर कभी कभी

निकला करो इधर से भी होकर कभी कभी
आया करो हमारे भी घर पर कभी कभी

माना कि रूठ जाना यूँ आदत है आप की
लगते मगर है ये अच्छे ये तेवर कभी कभी

साये की है तमन्ना दरख्तो को भी
प्यासा रहा है खुद भी समन्दर कभी कभी

गर सारे परिंदों को

गर सारे परिंदों को पिंजरों में बसा लोगे
सहरा में समंदर का फिर किससे पता लोगे

ये सोच के हम भीगे पहरों तक बारिश में
तुम अपनी छतरी में हमको भी बुला लोगे

इज़हारे-मुहब्बत की कुछ और भी रस्में हैं
कब तक मेरे पांवों के कांटे ही निकालोगे

सूरज हो, रहो सूरज,सूरज न रहोगे गर
सजदे में सितारों के सर अपना झुका लोगे

रूठों को मनाने में है देर लगे कितनी
दिल भी मिल जायेंगे गर हाथ मिला लोगे

आसां हो जायेगी हर मुश्किल पल-भर में
गर अपने बुजुर्गों की तुम दिल से दुआ लोगे

अजनबी अपना ही साया हो गया है

अजनबी अपना ही साया हो गया है
खून अपना ही पराया हो गया है

मांगता है फूल डाली से हिसाब
मुझपे क्या तेरा बकाया हो गया है

बीज बरगद में हुआ तब्दील तो
सेर भी बढ़कर सवाया हो गया है
बूँद ने सागर को शर्मिंदा किया
फिर धरा का सृजन जाया हो गया है

बात घर की घर में थी अब तक 'किरण'
राज़ अब जग पर नुमायाँ हो गया है

ग़ैर को ही पर सुनाये तो सही

ग़ैर को ही पर सुनाए तो सही
शेर मेरे गुनगुनाए तो सही

हाँ, नहीं हमसे, रकीबों से सही
आपने रिश्ते निभाए तो सही

किन ख़ताओं की मिली हमको सज़ा
ये कोई हमको बताए तो सही

आँख बेशक हो गई नम फिर भी हम
ज़ख़्म खाकर मुस्कुराए तो सही

याद आए हर घड़ी अल्लाह हमें
इस क़दर कोई सताए तो सही

ज़िन्दगी के तो नहीं पर मौत के
हम किसी के काम आए तो सही

रिश्ते

रिश्ते!
गीली लकड़ी की तरह
सुलगते रहते हैं
सारी उम्र।

कड़वा कसैला धुँआ
उगलते रहते हैं।

पर कभी भी जलकर भस्म नही होते
ख़त्म नही होते।

सताते हैं जिंदगी भर
किसी प्रेत की तरह!

नए साल की तरह

गुज़रो न बस क़रीब से ख़याल की तरह
आ जाओ ज़िंदगी में नए साल की तरह

कब तक तने रहोगे यूँ ही पेड़ की तरह
झुक कर गले मिलो कभी तो डाल की तरह

आँसू छलक पड़ें न फिर किसी की बात पर
लग जाओ मेरी आँख से रूमाल की तरह

ग़म ने निभाया जैसे आप भी निभाइए
मत साथ छोड़ जाओ अच्छे हाल की तरह

बैठो भी अब ज़हन में सीधी बात की तरह
उठते हो बार-बार क्यों सवाल की तरह

अचरज करूँ 'किरण' मैं जिसको देख उम्र-भर
हो जाओ ज़िंदगी में उस कमाल की तरह

व्यर्थ नहीं हूँ मैं

व्यर्थ नहीं हूँ मैं!
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे कारण ही हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम।

मैं स्त्री हूँ!
सहती हूँ
तभी तो तुम कर पाते हो गर्व अपने पुरूष होने पर
मैं झुकती हूँ!
तभी तो ऊँचा उठ पाता है
तुम्हारे अंहकार का आकाश।

मैं सिसकती हूँ!
तभी तुम कर पाते हो खुलकर अट्टहास
हूँ व्यवस्थित मैं
इसलिए तुम रहते हो अस्त व्यस्त।
मैं मर्यादित हूँ
इसीलिए तुम लाँघ जाते हो सारी सीमायें।
स्त्री हूँ मैं!

हो सकती हूँ पुरूष
पर नहीं होती
रहती हूँ स्त्री इसलिए
ताकि जीवित रहे तुम्हारा पुरूष
मेरी नम्रता, से ही पलता है तुम्हारा पौरुष

मैं समर्पित हूँ!
इसीलिए हूँ उपेक्षित, तिरस्कृत।
त्यागती हूँ अपना स्वाभिमान
ताकि आहत न हो तुम्हारा अभिमान
जीती हूँ असुरक्षा में
ताकि सुरक्षित रह सके
तुम्हारा दंभ।

सुनो!
व्यर्थ नहीं हूँ मैं!
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे कारण ही हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम।

दिल पे कोई नशा न तारी हो

दिल पे कोई नशा न तारी हो,
रूह तक होश में हमारी हो।

चंद फकीरों के संग यारी हो,
मुट्ठी में कायनात सारी हो।

हैं सभी हुस्न की इबादत में,
कौन अख़लाक़ का पुजारी हो।

ज़ख्म भी दे लगाए मरहम भी,
इस कदर नर्म-दिल शिकारी हो।

चाहती हूँ मेरे ख़ुदा मुझ पर
बस तेरे नाम की खुमारी हो।

मौत आए तो बेझिझक चल दें
इतनी पुख़्ता 'किरण' तयारी हो।

बात छोटी है मगर सादा नहीं

बात छोटी है मगर सादा नहीं
प्यार में हो कोई समझौता नहीं

तुम पे हक हो या फलक पे चाँद हो
चाहिए पूरा मुझे आधा नहीं

दिल के बदले दांव पर दिल ही लगे
इससे कुछ भी कम नहीं ज्यादा नहीं

मर मिटे हैं जो मेरी मुस्कान पर
उनको मेरे ग़म का अंदाज़ा नहीं

इक न इक दिन टूट जाना है 'किरण'
इसलिए करना कोई वादा नहीं

मुझमें जादू कोई जगा तो है
मेरी बातों में इक अदा तो है

नज़रें मिलते ही लडखडाया वो
मेरी आँखों में इक नशा तो है

आईने रास आ गये मुझको
कोई मुझ पे भी मर मिटा तो है

धूप की आंच कम हुई तो क्या
सर्दियों का बदन तपा तो है

नाम उसने मेरा शमां रक्खा
इस पिघलने में इक मज़ा तो है

देखकर मुझको कह रहा है वो
दर्दे-दिल की कोई दवा तो है

उसकी हर राह है मेरे घर तक
पास उसके मेरा पता तो है

वो 'किरण' मुझको मुझसे मांगे है
मेरे लब पे भी इक दुआ तो है

मत समझिये कि मैं औरत हूँ

मत समझिये कि मैं औरत हूँ, नशा है मुझमें
माँ भी हूँ, बहन भी, बेटी भी, दुआ है मुझमें।

हुस्न है, रंग है, खुशबू है, अदा है मुझमे
मैं मुहब्बत हूँ, इबादत हूँ, वफ़ा है मुझमें।

कितनी आसानी से कहते हो कि क्या है मुझमें
ज़ब्त है, सब्र-सदाक़त है, अना है मुझमें।

मैं फ़क़त जिस्म नहीं हूँ कि फ़ना हो जाऊं
आग है , पानी है, मिटटी है, हवा है मुझमें।

इक ये दुनिया जो मुहब्बत में बिछी जाये है
एक वो शख्स जो मुझसे ही खफा है मुझमें।

अपनी नज़रों में ही क़द आज बढ़ा है अपने
जाने कैसा ये बदल आज हुआ है मुझमें।

दुश्मनों में भी मेरा ज़िक्र ‘किरण’ है अक्सर
बात कोई तो ज़माने से जुदा है मुझमें।
मत समझिये कि मैं औरत हूँ, नशा है मुझमें
माँ भी हूँ, बहन भी, बेटी भी, दुआ है मुझमें।

हुस्न है, रंग है, खुशबू है, अदा है मुझमे
मैं मुहब्बत हूँ, इबादत हूँ, वफ़ा है मुझमें।

कितनी आसानी से कहते हो कि क्या है मुझमें
ज़ब्त है, सब्र-सदाक़त है, अना है मुझमें।

मैं फ़क़त जिस्म नहीं हूँ कि फ़ना हो जाऊं
आग है , पानी है, मिटटी है, हवा है मुझमें।

इक ये दुनिया जो मुहब्बत में बिछी जाये है
एक वो शख्स जो मुझसे ही खफा है मुझमें।

अपनी नज़रों में ही क़द आज बढ़ा है अपने
जाने कैसा ये बदल आज हुआ है मुझमें।

दुश्मनों में भी मेरा ज़िक्र ‘किरण’ है अक्सर
बात कोई तो ज़माने से जुदा है मुझमें।

मेरी बातों में इक अदा तो है

मुझमें जादू कोई जगा तो है
मेरी बातों में इक अदा तो है

नज़रें मिलते ही लडखडाया वो
मेरी आँखों में इक नशा तो है

आईने रास आ गये मुझको
कोई मुझ पे भी मर मिटा तो है

धूप की आंच कम हुई तो क्या
सर्दियों का बदन तपा तो है

नाम उसने मेरा शमां रक्खा
इस पिघलने में इक मज़ा तो है

देखकर मुझको कह रहा है वो
दर्दे-दिल की कोई दवा तो है

उसकी हर राह है मेरे घर तक
पास उसके मेरा पता तो है

वो 'किरण' मुझको मुझसे मांगे है
मेरे लब पे भी इक दुआ तो है

मिलता नहीं है कोई भी गमख्वार की तरह

मिलता नहीं है कोई भी गमख्वार की तरह
पेश आ रहे हैं यार भी अय्यार की तरह।

मुजरिम तुम्ही नहीं हो फ़क़त जुर्म-ए-इश्क के
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह।

वादों का लेन-देन है, सौदा है, शर्त है
मिलता कहाँ है प्यार भी अब प्यार की तरह।

ता-उम्र मुन्तज़िर ही रहे हम बहार के
इस बार भी न आई वो हर बार कीतरह।

अहले-जुनूं कहें के उन्हें संग-दिल कहें
मातम मना रहे हैं जो त्यौहार की तरह।

यादों के रोज़गार से जब से मिली निजात
हर रोज़ हमको लगता है इतवार की तरह।

पैकर ग़ज़ल का अब तो 'किरण' हम को कर अता
बिखरे हैं तेरे जेहन में अश'आर की तरह।

मुहब्बत का ज़माना आ गया

मुहब्बत का ज़माना आ गया है
गुलों को मुस्कुराना आ गया है।

नयी शाखों पे देखो आज फिर वो
नज़र पंछी पुराना आ गया है।

जुनूं को मिल गयी है इक तसल्ली
वफाओं का खज़ाना आ गया है।

उन्हें भी आ गया नींदे उडाना
हमें भी दिल चुराना आ गया है।

छुपाया था जिसे हमने हमी से
लबों पर वो फ़साना आ गया है।

नज़र से पी रहे हैं नूर उसका
संभलकर लडखडाना आ गया है।

मुहब्बत तो सभी करते हैं लेकिन
हमें करके निभाना आ गया है।

हमें तो मिल गया महबूब का दर
हमारा तो ठिकाना आ गया है।

हम अपने आईने के रु-ब-रु हैं
निशाने पर निशान आ गया है।

अँधेरा है घना हर और तो क्या
"किरण"को झिलमिलाना आ गया है।

बेवफा बावफा हुआ कैसे

बेवफा बावफा हुआ कैसे
ये करिश्मा हुआ भला कैसे।

वो जो खुद का सगा न हो पाया
हो गया है मेरा सगा कैसे।

जब नज़रिए में नुक्स हो साहिब
तो नज़र आएगा ख़ुदा कैसे।

सो गया हो ज़मीर ही जिसका
वो किसी का करे भला कैसे।

तूने बख्शा नहीं किसी को जब
माफ़ होगी तेरी ख़ता कैसे।

जब कफस में नहीं था दरवाज़ा
फिर परिंदा हुआ रिहा कैसे।

कितने हैरान हैं महल वाले
कोई मुफ़लिस यहाँ हंसा कैसे।

चाँद मेहमान है अंधेरों का
चुप रहेगी 'किरण' बता कैसे।

जिसकी आँखों में सिर्फ पानी है

जिसकी आँखों में सिर्फ पानी है
वो ग़ज़ल आपको सुनानी है

अश्क कैसे गिरा दूँ पलकों से
मेरे महबूब की निशानी है

लब पे वो बात ला नहीं पाए
जो कि हर हाल में बतानी है

कहीं आंसू कहीं तबस्सुम है
कुछ हकीकत है कुछ कहानी है

हमने लिखा नहीं किताबों में
अपना जो भी है मुंह ज़बानी है

कर दी आसान मुश्किलें सारी
मौत भी किस क़दर सुहानी है

आज तो बोल दे 'किरण' सब कुछ
ख़त्म पर फिर तो जिंदगानी है

मिलता नहीं है कोई भी गमख्वार की तरह

मिलता नहीं है कोई भी गमख्वार की तरह
पेश आ रहे हैं यार भी अय्यार की तरह।

मुजरिम तुम्ही नहीं हो फ़क़त जुर्म-ए-इश्क के
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह।

वादों का लेन-देन है, सौदा है, शर्त है
मिलता कहाँ है प्यार भी अब प्यार की तरह।

ता-उम्र मुन्तज़िर ही रहे हम बहार के
इस बार भी न आई वो हर बार कीतरह।

अहले-जुनूं कहें के उन्हें संग-दिल कहें
मातम मना रहे हैं जो त्यौहार की तरह।

यादों के रोज़गार से जब से मिली निजात
हर रोज़ हमको लगता है इतवार की तरह।

पैकर ग़ज़ल का अब तो 'किरण' हम को कर अता
बिखरे हैं तेरे जेहन में अश'आर की तरह।

मुकद्दर से न अब शिकवा करेंगे

मुक़द्दर से न अब शिकवा करेंगे
न छुप छुपके सनम रोया करेंगे।

दयारे-यार में लेंगे पनाहें
दरे-मह्बूब पर सजदा करेंगे।

हमीं ने ग़र शुरू की है कहानी
हमीं फिर ख़त्म ये किस्सा करेंगे।

जिसे ढूँढा ज़माने भर में हमने
कहीं वो मिल गया तो क्या करेंगे।

कहा किसने ये तुमसे उम्र-भर हम
तुम्हारी याद में तडपा करेंगे।

न होगा हमसे अब ज़िक्रे-मुहब्बत
वफ़ा के नाम से तौबा करेंगे।

खता हमसे हुयी आखिर ये कैसे
अकेले बैठकर सोचा करेंगे।

कि इस तर्के-तआलुक़ का सितमगर
किसी से भी नहीं चर्चा करेंगे।

हयाते- राह में सोचा नहीं था
हमारे पाँव भी धोखा करेंगे।

ज़माना दे'किरण'जिसकी मिसालें
क़लम में वो हुनर पैदा करेंगे।

उस दिन के लिए तैयार रहना

तुम पूरी कोशिश करते हो
मेरे दिल को दुखाने की
मुझे सताने की
रुलाने की
और इसमें पूरी तरह कामयाब भी होते हो---
सुनो!
मेरे आंसू तुम्हे
बहुत सुकून देते हैं ना!
तो लो..
आज जी भर के सता लो मुझे
देखना चाहते हो ना मेरी सहनशक्ति की सीमा
तो लो..
आज जी भर के
आजमा लो मुझे
और मेरे सब्र को
पर हाँ!
फिर उस दिन के लिए तैयार रहना
कि जिस दिन मेरे सब्र का बाँध टूटेगा
और बहा ले जायेगा तुम्हे
तुम्हारे अहंकार सहित इतनी दूर तक
कि जहाँ तुम
शेष नहीं बचोगे मुझे सताने के लिए
मेरा दिल दुखाने के लिए
मुझे आजमाने के लिए
पड़े होंगे पछतावे और शर्मिंदगी की रेत पर
अपने झूठे दम्भ्साहित
कहीं अकेले--
उस दिन के लिए
तैयार रहना--
तुम!

सितारे टूटकर गिरना हमें अच्छा नहीं लगता

सितारे टूटकर गिरना हमें अच्छा नहीं लगता
गुलों का शाख से झरना हमें अच्छा नहीं लगता।

सफ़र इस जिंदगी का यूँ तो है अँधा सफ़र लेकिन
उमीदें साथ हैं वरना हमें अच्छा नहीं लगता।

थे ताज़ा जब तलक हमको किसी की याद आती थी
पुराने ज़ख्म का भरना हमें अच्छा नहीं लगता।

हमारा नाम भी शामिल हो अब बेखौफ बन्दों में
जहाँ से इस कदर डरना हमें अच्छा नहीं लगता।

मुहब्बत हम करें तेरी इबादत सोचना भी मत
तुम्हारा ज़िक्र भी करना हमें अच्छा नहीं लगता।

भला हो या बुरा अब चाहे जो होना है हो जाये
किरण" ये रोज़ का मरना हमें अच्छा नहीं लगता।