केदारनाथ अग्रवाल / Kedarnath Agarwal

केदारनाथ अग्रवाल / Kedarnath Agarwal

पुकार

ऐ इन्सानों!
आँधी के झूले पर झूलो
आग बबूला बन कर फूलो
कुरबानी करने को झूमो
लाल सवेरे का मूँह चूमो
ऐ इन्सानों ओस न चाटो
अपने हाथों पर्वत काटो
पथ की नदियाँ खींच निकालो
जीवन पीकर प्यास बुझालो
रोटी तुमको राम न देगा
वेद तुम्हारा काम न देगा
जो रोटी का युद्ध करेगा
वह रोटी को आप वरेगा!

उन्नत पेड़ पलाश के

उन्नत पेड़ पलाश के

ढाल लिए रण में खड़े,
सम्मुख लड़ते सूर्य से

बाँह बली ऊपर किए
दुर्दिन में रह कर हरे,

छाँह घनी भू पर किए ।

छिपी भी

छिपी भी

न छिपी रह सकी हो तुम
भावों में अपने

खुल गई हो तुम,
जैसे खुल गई आँख

सजीव स्वप्न से भरी
चांदनी दर्पण में

कोई देखे, या न देखे,
मैं देखता हूँ तुम्हें ।

मौन भी
न मौन रह सकी हो तुम

वसन्त में अपने
मुखर हो गई हो तुम

जैसे मुखर शंख-से बजते रंग
फूल की मौन पंखुरियों से,

कोई सुने या न सुने,
मैं सुनता हूँ तुम्हें ।

पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा

इसी जन्म में,
इस जीवन में,
हमको तुमको मान मिलेगा।
गीतों की खेती करने को,
पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

क्लेश जहाँ है,
फूल खिलेगा,
हमको तुमको ज्ञान मिलेगा।
फूलों की खेती करने को,
पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

दीप बुझे हैं
जिन आँखों के,
उन आँखों को ज्ञान मिलेगा।
विद्या की खेती करने को,
पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

मैं कहता हूँ,
फिर कहता हूँ,
हमको तुमको प्राण मिलेगा।
मोरों-सा नर्तन करने को,
पूरा हिन्दुस्तान मिलेगा।

ऊपर ऊपर

ऊपर ऊपर

कली कली जब
काल छली चुन लेगा

तब इस भू पर
मूल मध्य से

वंश कली का फिर उपजेगा,
दल के दल केशर-पराग भर,

मुख-रस से भू-रज-विराग हर,
गंध-दान कर प्रवाहमान को

रूप-दान कर नवविहान को
काल कली के वृन्त-वृन्त पर
सुमन सहर्ष सदल विकसेगा ।

एक खिले फूल से

एक खिले फूल से
झाड़ी के एक खिले फूल ने
नीली पंखुरियों के
एक खिले फूल ने
आज मुझे काट लिया
ओठ से,
और मैं अचेत रहा
धूप में

लिपट गयी जो धूल

लिपट गयी जो धूल
लिपट गयी जो धूल पांव से

वह गोरी है इसी गांव की
जिसे उठाया नहीं किसी ने

इस कुठांव से।
ऐसे जैसे किरण

ओस के मोती छू ले
तुम मुझको

चुंबन से छू लो
मैं रसमय हो जाऊँ!

वह पठार जो जड़ बीहड़ था

कटते-कटते ध्वस्त हो गया,
धूल हो गया,
सिंचते-सिंचते,
दूब हो गया,
और दूब पर
वन के मन के-
रंग -रूप के, फूल खिल उठे,
वन फूलों से गंध-गंध
संसार हो गया।

समुद्र वह है

समुद्र वह है

जिसका धैर्य छूट गया है
दिककाल में रहे-रहे !

समुद्र वह है
जिसका मौन टूट गया है,

चोट पर चोट सहे-सहे !

तुम भी कुछ हो

तुम भी कुछ हो

तुम भी कुछ हो
लेकिन जो हो,
वह कलियों में
रूप-गन्ध की लगी गांठ है
जिसे उजाला
धीरे धीरे खोल रहा है।
यह जो
नग दिये के नीचे चुप बैठा है,
इसने मुझको
काट लिया है,
इस काटे का मंत्र तुम्हारे चुंबन में है,
तुम चुंबन से
मुझे जिला दो।

वह चिड़िया जो

वह चिड़िया जो-
चोंच मार कर
दूध-भरे जुंडी के दाने
रुचि से, रस से खा लेती है
वह छोटी संतोषी चिड़िया
नीले पंखों वाली मैं हूँ
मुझे अन्‍न से बहुत प्‍यार है।

वह चिड़िया जो-
कंठ खोल कर
बूढ़े वन-बाबा के खातिर
रस उँडेल कर गा लेती है
वह छोटी मुँह बोली चिड़िया
नीले पंखों वाली मैं हूँ
मुझे विजन से बहुत प्‍यार है।

वह चिड़िया जो-
चोंच मार कर
चढ़ी नदी का दिल टटोल कर
जल का मोती ले जाती है
वह छोटी गरबीली चिड़िया
नीले पंखों वाली मैं हूँ
मुझे नदी से बहुत प्‍यार है।

दिन है कि

दिन है कि

हंस हलाहल पर
मंद मधुर तिर रहा है

दिन है कि
चरने गई गाय का

सफ़ेद बछड़ा
माँ की प्रतीक्षा में बैठा है ।

पूंजीवादी व्यवस्था

हे मेरी तुम
डंकमार संसार न बदला
प्राणहीन पतझार न बदला
बदला शासन, देश न बदला
राजतंत्र का भेष न बदला,
भाव बोध उन्मेष न बदला,
हाड़-तोड़ भू भार न बदला
कैसे जियें?
यही है मसला
नाचे कोैन बजाये तबला?

मार्क्सवाद की रोशनी

दोषी हाथ
हाथ जो
चट्टान को
तोडे़ नहीं
वह टूट जाये,

लोहे को
मोड़े नहीं
सौ तार को
जोड़े नहीं
वह टूट जाये।

जलाशय के

जलाशय के

सौन्दर्य की बंद हथेलियाँ
आज जब

मृणाल पर खुलीं
सूर्य ने

अलियों ने
तुमने

उन्हें चूमा
मैंने
तुम्हें चूमा

प्रक्रति चित्र

जिसने सोने को खोदा,
लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का
घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा

मैं हूँ

मैं हूँ

आग और बर्फ़ की वसीयत
मौत जिसे पाएगी

जीवन से लिखी ।

रंग नहीं

रंग नहीं

रथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों के

सांध्य गगन में ।
देखो--बस--देखो !
रंग नहीं

ध्वज फहरते हैं रंगीन स्वप्नों के

सांध्य गगन में ।
झूमो--बस--झूमो !
रंग नहीं

नट नाचते हैं रंगीन छंदों के

सांध्य गगन में !
नाचो--बस--नाचो !

काल बंधा है

काल बंधा है

दिव-देवालय

के पाषाणी

वृषभ कण्ठ से;

बधिर, अचंचल,

घंटे जैसा

मौन टंगा है

आसमान से

भू तक लटका;

मैं अनबजा

वही घंटा हूँ ।

देर हो गई है...

देर हो गई है दिवाकर को गए अदृश्य में

विवर्ण हो गया है सवर्ण तट पर खड़ा

पूर्व का ऎरावत
निकट आ ही गया है बरौनियों से बेधता

विकट अंधकार
खुल कर फैल ही रहा है अब

सविस्तार
श्याम केश-भार
चकित कर रहा है अब भी

जल में जीवित
डूब गए सूरज का
अपराजित प्रकाश ।

हम जिएँ न जिएँ दोस्त

हम जिएँ न जिएँ दोस्त

तुम जियो एक नौजवान की तरह,

खेत में झूम रहे धान की तरह,

मौत को मार रहे वान की तरह ।

हम जिएँ न जिएँ दोस्त

तुम जियो अजेय इंसान की तरह

मरण के इस रण में अमरण

आकर्ण तनी
कमान की तरह !

याद ?

याद ?

है आवाज़

पथ के पेड़ की,

राहगीरों के लिए

जो गए

लौटे नहीं
इस राह से !
वह

सुबह की चांदनी है
ओस से भीगी हुई

धूप का दर्पण लिए

ओट में गूंगी खड़ी ।

वह

नदी के नील जल की वासना है

जो कगारों को

डिगाए जा रही है।