Kedar Nath Singh

केदारनाथ सिंह / Kedarnath Singh

केदारनाथ सिंह / Kedarnath Singh

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर-झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों —
सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए
लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,
चिलबिल की नंगी बाँहों में —
भरने लगा एक खोयापन,

बड़ी हो गई कटु कानों को 'चुर-मुर' ध्वनि बाँसों के वन की ।

थक कर ठहर गई दुपहरिया,
रुक कर सहम गई चौबाई,
आँखों के इस वीराने में —
और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की ।

मंच और मचान

पत्तों की तरह बोलते
तने की तरह चुप
एक ठिंगने से चीनी भिक्खु थे वे
जिन्हें उस जनपद के लोग कहते थे
चीना बाबा

कब आए थे रामाभार स्तूप पर
यह कोई नहीं जानता था
पर जानना जरूरी भी नहीं था
उनके लिए तो बस इतना ही बहुत था
कि वहाँ स्तूप पर खड़ा है
चिड़ियों से जगरमगर एक युवा बरगद
बरगद पर मचान है
और मचान पर रहते हैं वे
जाने कितने समय से

अगर भूलता नहीं तो यह पिछली सदी के
पाँचवें दशक का कोई एक दिन था
जब सड़क की ओर से भोंपू की आवाज आई
"भाइयो और बहनो,
प्रधानमंत्री आ रहे हैं स्तूप को देखने..."

प्रधानमंत्री!
खिल गए लोग
जैसे कुछ मिल गया हो सुबह सुबह
पर कैसी विडंबना
कि वे जो लोग थे
सिर्फ नेहरू को जानते थे
प्रधानमंत्री को नहीं!

सो इस शब्द के अर्थ तक पहुँचने में
उन्हें काफी दिक्कत हुई
फिर भी सुर्ती मलते और बोलते बतियाते
पहुँच ही गए वे वहाँ तक
कहाँ तक?
यह कहना मुश्किल है

कहते हैं- प्रधानमंत्री आये
उन्होंने चारों ओर घूम कर देखा स्तूप को
फिर देखा बरगद को
जो खड़ा था स्तूप पर

पर न जाने क्यों
वे हो गए उदास
(और कहते हैं- नेहरू अक्सर
उदास हो जाते थे)
फिर जाते जाते एक अधिकारी को
पास बुलाया
कहा- देखो- उस बरगद को गौर से देखो
उसके बोझ से टूट कर
गिर सकता है स्तूप
इसलिए हुक्म है कि देशहित में
काट डालो बरगद
और बचा लो स्तूप को

यह राष्ट्र के भव्यतम मंच का आदेश था
जाने अनजाने एक मचान के विरुद्ध
इस तरह उस दिन एक अद्भुत घटना घटी
भारत के इतिहास में
कि मंच और मचान
यानी एक ही शब्द के लंबे इतिहास के
दोनों ओरछोर
अचानक आ गए आमने सामने

अगले दिन
सूर्य के घंटे की पहली चोट के साथ
स्तूप पर आ गए-
बढ़ई
मजूर
इंजीनियर
कारीगर
आ गए लोग दूर दूर से

इधर अधिकारी परेशान
क्योंकि उन्हें पता था
खाली नहीं है बरगद
कि उस पर एक मचान है
और मचान भी खाली नहीं
क्योंकि उस पर रहता है एक आदमी
और खाली नहीं आदमी भी
क्योंकि वह जिंदा है
और बोल सकता है

क्या किया जाय?
हुक्म दिल्ली का
और समस्या जटिल
देर तक खड़े-खड़े सोचते रहे वे
कि सहसा किसी एक ने
हाथ उठा प्रार्थना की-
"चीना बाबा,
ओ ओ चीना बाबा!
नीचे उतर आओ
बरगद काटा जायेगा"
"काटा जाएगा?
क्यों? लेकिन क्यों?"
जैसे पत्तों से फूट कर जड़ों की आवाज आई

"ऊपर का आदेश है-"
नीचे से उतर गया

"तो शुनो,"- भिक्खु अपनी चीनी गमक वाली
हिंदी में बोला,
'चाये काट डालो मुझी को
उतरूँगा नईं
ये मेरा घर है!"

भिक्खु की आवाज में
बरगद के पत्तों के दूध का बल था

अब अधिकारियों के सामने
एक विकट सवाल था- एकदम अभूतपूर्व
पेड़ है कि घर- -
यह एक ऐसा सवाल था
जिस पर कानून चुप था
इस पर तो कविताएं भी चुप हैं
एक कविता प्रेमी अधिकारी ने
धीरे से टिप्पणी की

देर तक
दूर तक जब कुछ नहीं सूझा
तो अधिकारियों ने राज्य के उच्चतम
अधिकारी से संपर्क किया
और गहन छानबीन के बाद पाया गया-
मामला भिक्खु के चीवर सा
बरगद की लंबी बरोहों से उलझ गया है
हार कर पाछ कर अंततः तय हुआ
दिल्ली से पूछा जाय

और कहते हैं-
दिल्ली को कुछ भी याद नहीं था
न हुक्म
न बरगद
न दिन
न तारीख
कुछ भी - कुछ भी याद ही नहीं था

पर जब परतदरपरत
इधर से बताई गई स्थिति की गंभीरता
और उधर लगा कि अब भिक्खु का घर
यानी वह युवा बरगद
कुल्हाड़े की धार से बस कुछ मिनट दूर है
तो खयाल है कि दिल्ली ने जल्दी जल्दी
दूत के जरिए बीजिंग से बात की
इस हल्की सी उम्मीद में कि शायद
कोई रास्ता निकल आये
एक कयास यह भी
कि बात शायद माओ की मेज तक गयी

अब यह कितना सही है
कितना गलत
साक्ष्य नहीं कोई कि जाँच सकूँ इसे
पर मेरा मन कहता है काश यह सच हो
कि उस दिन
विश्व में पहली बार दो राष्ट्रों ने
एक पेड़ के बारे में बातचीत की

-तो पाठकगण
यह रहा एक धुँधला सा प्रिंटआउट
उन लोगों की स्मृति का
जिन्हें मैंने खो दिया था बरसों पहले

और छपते छपते इतना और
कि हुक्म की तामील तो होनी ही थी
सो जैसेतैसे पुलिस के द्वारा
बरगद से नीचे उतारा गया भिक्खु को
और हाथ उठाए - मानो पूरे ब्रह्मांड में
चिल्लाता रहा वह-
"घर है...ये...ये....मेरा घर है'

पर जो भी हो
अब मौके पर मौजूद टाँगों कुल्हाड़ों का
रास्ता साफ था
एक हल्का सा इशारा और ठक्‌ ...ठक्‌
गिरने लगे वे बरगद की जड़ पर
पहली चोट के बाद ऐसा लगा
जैसे लोहे ने झुक कर
पेड़ से कहा हो- "माफ करना भाई,
कुछ हुक्म ही ऐसा है"
और ठक्‌ ठक्‌ गिरने लगा उसी तरह
उधर फैलती जा रही थी हवा में
युवा बरगद के कटने की एक कच्ची गंध
और "नहीं...नहीं..."
कहीं से विरोध में आती थी एक बुढ़िया की आवाज
और अगली ठक्‌ के नीचे दब जाती थी
जाने कितनी चहचह
कितने पर
कितनी गाथाएँ
कितने जातक
दब जाते थे हर ठक्‌ के नीचे
चलता रहा वह विकट संगीत
जाने कितनी देर तक

-कि अचानक
जड़ों के भीतर एक कड़क सी हुई
और लोगों ने देखा कि चीख न पुकार
बस झूमता झामता एक शाहाना अंदाज में
अरअराकर गिर पड़ा समूचा बरगद
सिर्फ 'घर' - वह शब्द
देर तक उसी तरह
टँगा रहा हवा में

तब से कितना समय बीता
मैंने कितने शहर नापे
कितने घर बदले
और हैरान हूँ मुझे लग गया इतना समय
इस सच तक पहुँचने में
कि उस तरह देखो
तो हुक्म कोई नहीं
पर घर जहाँ भी है
उसी तरह टँगा है.

विद्रोह

आज घर में घुसा
तो वहाँ अजब दृश्य था
सुनिए — मेरे बिस्तर ने कहा —
यह रहा मेरा इस्तीफ़ा
मैं अपने कपास के भीतर
वापस जाना चाहता हूँ

उधर कुर्सी और मेज़ का
एक सँयुक्त मोर्चा था
दोनों तड़पकर बोले —
जी, अब बहुत हो चुका
आपको सहते-सहते
हमें बेतरह याद आ रहे हैं
हमारे पेड़
और उनके भीतर का वह
ज़िन्दा द्रव
जिसकी हत्या कर दी है
आपने

उधर आलमारी में बन्द
क़िताबें चिल्ला रही थीं
खोल दो, हमें खोल दो
हम जाना चाहती हैं अपने
बाँस के जंगल
और मिलना चाहती हैं
अपने बिच्छुओं के डंक
और साँपों के चुम्बन से

पर सबसे अधिक नाराज़ थी
वह शॉल
जिसे अभी कुछ दिन पहले कुल्लू से ख़रीद लाया था
बोली — साहब!
आप तो बड़े साहब निकले
मेरा दुम्बा भेड़ा मुझे कब से
पुकार रहा है
और आप हैं कि अपनी देह
की क़ैद में
लपेटे हुए हैं मुझे

उधर टी० वी० और फ़ोन का
बुरा हाल था
ज़ोर-ज़ोर से कुछ कह रहे थे
वे
पर उनकी भाषा
मेरी समझ से परे थी
कि तभी
नल से टपकता पानी तड़पा —
अब तो हद हो गई साहब!
अगर सुन सकें तो सुन
लीजिए
इन बूँदों की आवाज़ —
कि अब हम
यानी आपके सारे के सारे
क़ैदी
आदमी की जेल से
मुक्त होना चाहते हैं

अब जा कहाँ रहे हैं —
मेरा दरवाज़ा कड़का
जब मैं बाहर निकल रहा था।

दिशा

हिमालय किधर है?

मैंने उस बच्‍चे से पूछा जो स्‍कूल के बाहर

पतंग उड़ा रहा था

उधर-उधर-उसने कहाँ

जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी

मैं स्‍वीकार करूँ

मैंने पहली बार जाना

हिमालय किधर है?

बनारस

इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन

तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़

इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घनटे
शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाँव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है

आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्‍यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं भी है

जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्‍थंभ के
जो नहीं है उसे थामें है
राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्‍थंभ
आग के स्‍थंभ
और पानी के स्‍थंभ
धुऍं के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्‍थंभ

किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर!

नए कवि का दुख

दुख हूँ मैं एक नये हिन्दी कवि का
बाँधो
मुझे बाँधो
पर कहाँ बाँधोगे
किस लय, किस छन्द में?

ये छोटे छोटे घर
ये बौने दरवाजे
ताले ये इतने पुराने
और साँकल इतनी जर्जर
आसमान इतना जरा सा
और हवा इतनी कम कम
नफरतयह इतनी गुमसुम सी
और प्यार यह इतना अकेला
और गोल -मोल
बाँधो
मुझे बाँधो
पर कहाँ बाँधोगे
किस लय , किस छन्द में?

क्या जीवन इसी तरह बीतेगा
शब्दों से शब्दों तक
जीने
और जीने और जीने ‌‌और जीने के
लगातार द्वन्द में?

तुम आयीं

तुम आयीं
जैसे छीमियों में धीरे- धीरे
आता है रस
जैसे चलते - चलते एड़ी में
काँटा जाए धँस
तुम दिखीं
जैसे कोई बच्चा
सुन रहा हो कहानी
तुम हँसी
जैसे तट पर बजता हो पानी
तुम हिलीं
जैसे हिलती है पत्ती
जैसे लालटेन के शीशे में
काँपती हो बत्ती !
तुमने छुआ
जैसे धूप में धीरे- धीरे
उड़ता है भुआ

और अन्त में
जैसे हवा पकाती है गेहूँ के खेतों को
तुमने मुझे पकाया
और इस तरह
जैसे दाने अलगाये जाते है भूसे से
तुमने मुझे खुद से अलगाया ।

जब वर्षा शुरु होती है

जब वर्षा शुरु होती है
कबूतर उड़ना बन्द कर देते हैं
गली कुछ दूर तक भागती हुई जाती है
और फिर लौट आती है

मवेशी भूल जाते हैं चरने की दिशा
और सिर्फ रक्षा करते हैं उस धीमी गुनगुनाहट की
जो पत्तियों से गिरती है
सिप् सिप् सिप् सिप्

जब वर्षा शुरु होती है
एक बहुत पुरानी सी खनिज गंध
सार्वजनिक भवनों से निकलती है
और सारे शहर में छा जाती है

जब वर्षा शुरु होती है
तब कहीं कुछ नहीं होता
सिवा वर्षा के
आदमी और पेड़
जहाँ पर खड़े थे वहीं खड़े रहते हैं
सिर्फ पृथ्वी घूम जाती है उस आशय की ओर
जिधर पानी के गिरने की क्रिया का रुख होता है।

बुनाई का गीत

उठो सोये हुए धागों
उठो
उठो कि दर्जी की मशीन चलने लगी है
उठो कि धोबी पहुँच गया घाट पर
उठो कि नंगधड़ंग बच्चे
जा रहे हैं स्कूल
उठो मेरी सुबह के धागो
और मेरी शाम के धागों उठो

उठो कि ताना कहीं फँस रहा है
उठो कि भरनी में पड़ गई गाँठ
उठो कि नाव के पाल में
कुछ सूत कम पड़ रहे हैं

उठो
झाड़न में
मोजो में
टाट में
दरियों में दबे हुए धागो उठो
उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है
उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा
फिर से बुनना होगा
उठो मेरे टूटे हुए धागो
और मेरे उलझे हुए धागो उठो

उठो
कि बुनने का समय हो रहा है

शहरबदल

वह एक छोटा-सा शहर था
जिसे शायद आप नहीं जानते
पर मैं ही कहाँ जानता था वहाँ जाने से पहले
कि दुनिया के नक्शे में कहाँ है वह।
लेकिन दुनिया शायद उन्हीं छोटे-छोटे शहरों के
ताप से चलती है
जिन्हें हम-आप नहीं जानते।
जाने को तो मैं जा सकता था कहीं भी
क्या बुरा था भैंसालोटन
हर्ज़ क्या था गया या गुंटूर जाने में
पर गया मैं गया नहीं
( वैसे भी संन्यास मैंने नहीं लिया था )
कलकत्ते से मिला नहीं छंद
जयपुर जा सकता था
पर गालता के पत्थरों ने खींचा नहीं मुझे
शहर अनेक थे जिनके नामों का ज़ादू
उन युवा दिनों में
प्याज़ की छौंक की तरह खींचता था मुझे
पर हुआ यों कि उन नामों के बारे में
सोचते-सोचते
जब एक दिन थक गया
तो अटैची उठाई
और चप्पल फटकारते हुए
चल दिया पडरौना -- उसी शहर में
जिसके नाम का उच्चारण
एक लड़की को लगता था ऊँट के कोहान की तरह
अब इतने दिनों बाद
कभी-कभार सोचता हूँ
मैं क्यों गया पडरौना?
कोई क्यों जाता है कहीं भी
अपने शहर को छोड़कर --
यह एक ऐसा रहस्य है
जिसके सामने एक शाम ठिठक गए थे ग़ालिब
लखनऊ पहुँचकर।
पर जो सच है वह सीधा-सा
सादा-सा सच है कि एक सुबह मैं उठा
बनारस को कहा राम-राम
और चल दिया उधर
जिधर हो सकता था पडरौना --
वह गुमनाम-सा शहर
जहाँ एक दर्ज़ी कि मशीन भी इस तरह चलती थी
जैसे सृष्टि के शुरू से चल रही हो उसी तरह
और एक ही घड़ी थी
जिससे चिड़ियों का भी काम चलता था
और आदमी का भी
और समय था कि आराम से पड़ा रहता था
लोगों के कन्धों पर
एक गमछे की तरह।
पर शहर की तरह
उस छोटे-से शहर का भी अपना एक संगीत था
जो अक्सर एक पिपिहिरी से शुरू होता था
और ट्रकों के ताल पर चलता रहता था दिन भर
जिसमें हवा की मुर्कियाँ थीं
और बैलगाड़ियों की मूर्च्छना
और धूल के उठते हुए लंबे आलाप
और एक विलम्बित-सी तान दोपहरी-पसिंजर की
जो अक्सर सूर्यास्त के देर बाद आती थी
इस तरह एक दुर्लभ वाद्यवृन्द-सा
बजता ही रहता था महाजीवन
उस छोटे-से शहर का
जिसकी लय पर चलते हुए
कभी-कभी बेहद झुंझला उठता था मैं
कि वे जो लोग थे उनके घुटनों में
एक ऐसा विकट और अथाह धीरज था
कि शाम के नमक के लिए
सुबह तक खड़े-खड़े कर सकते थे इंतज़ार
नमस्कार ! नमस्कार!
मैं कहता था उनसे
उत्तर में सिर्फ़ हँसते थे वे
जिसमें गूँजता था सदियों का संचित हाहाकार...