कुलदीप वर्मा / Kuldeep Verma

हे अत्याचारी, निर्दयी मानव,
किस छद्म वेष में आया है?
मनुष्य योनी में जीवन पाकर,
दानव का रूप बनाया है!!
हिम घाटी की विभीषिका हो,
या कोई वीभत्स रेल दुर्घटना,
मृत माँ-बहनों के तन से तूने,
अंग काट स्वर्ण चुराया है!!
अरे स्वार्थ के कलुषित पुतले,
तूने पशुओं का स्वांग रचाया है|
हे अत्याचारी.. दुराचार की हद्द हो गयी,
किस नशे की यह ज्वाला है?
जल गयी हैं जिनमें असंख्य दामिनी,
ना सुरक्षित रहीं हिंद बाला हैं|
मानवता के ‘मान’ को भूला,
माँ की कोख को लजाया है|
हे अत्याचारी..

मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरूद्वारे,
ना छोड़े तूने सुरक्षित आज|
किस धरम में लिखा है पगले,
कि दुनिया में फैले आतंकी राज?
WTC, ताज होटल, सेंट्रल स्टेशन
और कई ठिकानों पर, कैसा यह ग़दर मचाया है,
मासूमों की जान झड़प कर,
राक्षस सा अट्टाहस लगाया है|