महावीर प्रसाद द्विवेदी /Mahaveer Prasad Dwivedi

महावीर प्रसाद द्विवेदी / Mahaveer Prasad Dwivedi

प्यारा वतन

प्यारे वतन हमारे प्यारे,
आजा, आजा, पास हमारे ।
या तू अपने पास बुलाकर,
रख छाती से हमें लगाकर ॥

जब तू मुझे याद आता है,
तब दिल मेरा घबराता है ।
आँख आँसू बरसाती है,
रोते रोते थक जाती है ॥

तुझसे जो आराम मिला है,
दिल पर उसका नक्श हुआ है ।
उसे याद कर मैं रोता हूँ,
रो रोकर आँखे धोता हूँ ।।
कच्चा घर जो छोटा-सा था,
पक्के महलो से अच्छा था ।
पेड़ नीम का दरवाज़े पर,
सायबान से था वह बेहतर ।।

सब्ज़ खेत जो लहराते थे,
दिल को वे कैसे भाते थे ।
फर्श मखमली जो बिछते है,
नहीं मुझे अच्छे लगते हैं ॥

वह जंगल की हवा कहाँ है ?
वह इस दिल की दवा कहाँ है?
कहाँ टहलने का रमना है ?
लहरा रही कहाँ जमना है ? ।। वह मोरों का शोर कहाँ है ?
श्याम घटा घनघोर कहाँ है?
कोयल की मीठी तानो को,
सुन सुख देते थे कानो को ।।

ज्यो ही आम पेड़ से टपका,
मै फौरन लेने को लपका ।
चढा उचक कर डाली डाली,
खाई जामन काली काली ।।

जब यह मुझे याद आता है,
नहीं मुझे तब क़ुछ भाता है ।
वे दिन क्या फिर कभी मिलेगे?
क्या फिर अपने दिन पलटेंगे? ।।
वे लंगोटिये यार कहाँ हैं?
वे सच्चे ग़मख्वार कहाँ हैं?
वह घर वह बैठक मन भाई,
क्या फिर कभी मिलेगी भार्ड ? ।।
आँख-मिचौनी की वे घातें,
खेल-कूद के दिन और रातें।
हाय कहाँ है ! हाय कहाँ हैं!
कहाँ मिलें जो ढूँढा चाहें? ।।
बिछडा वतन हुआ यह बेजा,
फटता है सुब किये कलेजा ।
ठाठ अमीरी के सब तुझ पर,
मिले अगर तू, करै निछावर ।।

जै जै प्यारे भारत देश

जै जै प्यारे देश हमारे
तीन लोक में सबसे न्यारे ।
हिमगिरी-मुकुट मनोहर धारे
जै जै सुभग सुवेश ।। जै जै... ।।

हम बुलबुल तू गुल है प्यारा
तू सुम्बुल,  तू देश हमारा ।
हमने तन-मन तुझ पर वारा
तेज पुंज-विशेष ।। जै जै ... ।।

तुझ पर हम निसार हो जावें
तेरी रज हम शीश चढ़ावें ।
जगत पिता से यही मनावें
होवे तू देशेश ।। जै जै... ।।

जै जै हे देशों के स्वामी
नामवरों में भी हे नामी ।
हे प्रणम्य तुझको प्रणमामी
जीते रहो हमेश ।। जै जै... ।।

आँख अगर कोई दिखलावे
उसका दर्प-दलन हो जावे ।
फल अपने कर्मों का पावे
बने नामनि शेष ।। जै जै... ।।

बल दो हमें ऐक्य सिखलाओ
सँभलो देश होश में आवो ।
मातृभूमि-सौभाग्य बढ़ाओ
मेटो सकल कलेश ।। जै जै... ।।

हिन्दू मुसल्मान ईसाई
यश गावें सब भाई-भाई ।
सब के सब तेरे शैदाई
फूलो-फलो स्वदेश ।। जै जै... ।।

इष्टदेव आधार हमारे
तुम्हीं गले के हार हमारे ।
भुक्ति-मुक्ति के द्वार हमारे
जै जै जै जै देश ।। जै जै...

कोकिल

कोकिल अति सुंदर चिड़िया है,
सच कहते हैं, अति बढ़िया है।
जिस रंगत के कुँवर कन्हाई,
उसने भी वह रंगत पाई।
बौरों की सुगंध की भाँती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वंशी-धुनि जैसे।
सिर ऊँचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

आर्य-भूमि

जहाँ हुए व्यास मुनि-प्रधान,
रामादि राजा अति कीर्तिमान।
जो थी जगत्पूजित धन्य-भूमि ,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि ।।

जहाँ हुए साधु हा महान्
थे लोग सारे धन-धर्म्मवान्।
जो थी जगत्पूजित धर्म्म-भूमि,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।

जहाँ सभी थे निज धर्म्म धारी,
स्वदेश का भी अभिमान भारी ।
जो थी जगत्पूजित पूज्य-भूमि,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।

हुए प्रजापाल नरेश नाना,
प्रजा जिन्होंने सुत-तुल्य जाना ।
जो थी जगत्पूजित सौख्य- भूमि ,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।

वीरांगना भारत-भामिली थीं,
वीरप्रसू भी कुल- कामिनी थीं ।
जो थी जगत्पूजित वीर- भूमि,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।

स्वदेश-सेवी जन लक्ष लक्ष,
हुए जहाँ हैं निज-कार्य्य दक्ष ।
जो थी जगत्पूजित कार्य्य-भूमि,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।

स्वदेश-कल्याण सुपुण्य जान,
जहाँ हुए यत्न सदा महान।
जो थी जगत्पूजित पुण्य भूमि,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।

न स्वार्थ का लेन जरा कहीं था,
देशार्थ का त्याग कहीं नहीं था।
जो थी जगत्पूजित श्रेष्ठ-भुमि,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।

कोई कभी धीर न छोड़ता था,
न मृत्यु से भी मुँह मोड़ता था।
जो थी जगत्पूजित धैर्य्य- भूमि,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।
स्वदेश के शत्रु स्वशत्रु माने,
जहाँ सभी ने शर-चाप ताने ।
जो थी जगत्पूजित शौर्य्य-भूमि,
वही हमारी यह आर्य्य-भूमि।।

अनेक थे वर्ण तथापि सारे
थे एकताबद्ध जहाँ हमारे
जो थी जगत्पूजित ऐक्य-भूमि,
वही हमारी यह आर्य भूमि ।।

थी मातृभूमि-व्रत-भक्ति भारी,
जहाँ हुए शुर यशोधिकारी ।
जो थी जगत्पूजित कीर्ति-भूमि,
वही हमारी यह आर्यभूमि ।।

दिव्यास्त्र विद्या बल, दिव्य यान,
छाया जहाँ था अति दिव्य ज्ञान ।
जो थी जगत्पूजित दिव्यभूमि,
वही हमारी यह आर्यभूमि ।।

नए नए देश जहाँ अनेक,
जीत गए थे नित एक एक ।
जो थी जगत्पूजित भाग्यभूमि,
वही हमारी यह आर्यभूमि ।।

विचार ऐसे जब चित्त आते,
विषाद पैदा करते, सताते ।
न क्या कभी देव दया करेंगे ?
न क्या हमारे दिन भी फिरेंगे ?