Mohan Rana

मोहन राणा / Mohan Rana

मोहन राणा / Mohan Rana

गर्भ से बाहर

काले रंग को पहचानना असंभव होता है
सब ओर जब अंधकार हो
पर अगर देख सकते हैं हम
और कहते उसे स्याह
कैसा है सोचकर
तो कोई स्रोत तो होगा ही उसे देखने के लिए

वे आँख नहीं
वह मन नहीं
फिर क्या
जो कर दे अपनी पुष्टि
कैसे करूँ प्रमाणित कि सहमति हो जाय हमारे बीच
अपने अपने अंधेरे पर

भाषा ने परिभाषित कर
सीमित कर दिया अनुभूति को
गर्भ से बाहर
हम अंधेरा देख सकते हैं
या रोशनी की जरूरत भ्रम है!
या बस जन्मजात आदत है

कुछ देखने के लिए कि
कुछ लिख दूँ अंधेरे में
स्याही से
जो पढ़ा जा सके रोशनी की दुनिया में

चींटी

मुझे नहीं मालूम
नहीं मालूम कि तुम जानना क्या चाहते हो
यही बचाव
सफाई मैं देता रहा
सच के सवाल पर
और वे पूछते रहे फिर भी
उन्हें सच पर शक था
वह अजनबी था उनके संसार में


और मैं
ले जाता अपने वज़न से कई गुना झूठ
यहाँ से वहाँ
उसे सच समझ कर


डूबता हुआ सूरज छोड़ गया
सुनहरे कण पत्तों पर,
पेड़ उन्हें धरती में ले गया अपनी जड़ों में
और कुछ मैंने छुपा लिए पलकों में
बुरे मौसम की आशंका में,
किसी दरार को सींते हुए

पानी पर चलते

आकाश को ताकते
मैं नज़र रखे हूँ
मौसम पर
दोपहर के मूड पर
बिल्कुल सावधान
एकटक
अपलक निश्वास

चिड़ियाँ मुझे लहरों पर डगमगाता कोई पुतला समझती हैं
समय मिटा चुका है मुस्कराहट मेरे चेहरे से,
एक आएगी कोई लहर कहीं से
ले जाएगी मुझे किसी और किनारे पर

और मैं भूल भी चुका यह हुआ कब
या सपना तो नहीं मैं देखता
तट पर सोई उन्मीलित नीली आँखों का

गली

हम सुनेंगे तुम्हारे स्वरों को चुपचाप

रिमझिम में भीगते

धोते अपने अंतर को उनकी धारा में,

बारिश चली जाएगी

अनजाने अंतरालों में

समेटते स्मृतियों की कतरनों में

जाने कब से दम साधे बोल पड़ती अनुगूँज दोपहर की

तुम्हें सुनते सुनते

तीन मनुष्य

वे नहीं देखते बुरा
वे नहीं सुनते बुरा
वे नहीं कहते बुरा
वे गाँधी जी के तीन बन्दर नहीं थे,
तीन मनुष्य

तीन मनुष्य बहुत अकेले
अपने ही अवकाश में
बाजुओं को फैला
बीच दोपहरी में आँखों को बंद किए
यहाँ बहुत अँधेरा है
तुम कहाँ हो
कहाँ हो तुम
हाथ टटोलते
अन्य हाथों को
यहाँ बहुत अँधेरा है

तलघर में बैठे
वे चमकती धूप को पुकारते
खोयी हुई हवा को बुलाते
प्रेम का खुशी से क्या संबंध वे पूछते
अतीत के उत्खनन में
पर हर चीज़ पर धूल है
पीड़ा भी धूल है
दर्शक ही तो हूँ मैं इस नाटक में,
तीन मनुषय खोद रहे हैं ट्यूबवैल अपने अतीत में
उस गहराई तक जिसमें प्रदूषण न हो
जो पानी न हो
जो उन्हें अमर कर दे
पर खत्म हो जाता है नाटक इससे पहले

फिलिप्स का रेडियो

उस पर विविध भारती और समाचार सुनते घर पुराना हो गया
उसके साथ ही ऊँची नीची आवाज़ें कमजोर तरंगें
उसके नॉब भी खो गये पिछली सफेदी में
धूप में गरमाये सेल रात के अँधेरे में एकाएक चुप हो जाते हैं
समाचारों के बीच ,
आंइडहोवन* की खुली सड़कों में तेज हवा से बचते शहर के बीच
खड़ी विशाल फिलिप्स कॉर्पोऱेशन की इमारत को देखता,
जेब्राक्रासिंग पे खड़ा सोचता,
क्या यह फिलिप्स रेडयो है !

दूसरा दिन

आते ही खोल देता है संदूकची
पुराने कपड़ो की
जिनसे बहुत परिचित होते हैं
उन्हें कौन पहचानता है
जो नहीं दिखता
उसे कौन याद करता है
दूसरा दिन
दूसरा आदमी
दूसरी औरत
कोई और
आते ही उधेड़ देता है कल लगे टाँके