नरोत्तमदास / Narottam Das

नरोत्तमदास / Narottam Das

वृक्षत्व

माधवी के नीचे बैठा था

कि हठात् विशाखा हवा आयी

और फूलों का एक गुच्छ

मुझ पर झर उठा;

माधवी का यह वृक्षत्व

मुझे आकण्ठ सुगंधित कर गया ।

उस दिन

एक भिखारी ने भीख के लिए ही तो गुहारा था

और मैंने द्वाराचार में उसे क्या दिया ?-

उपेक्षा, तिरस्कार

और शायद ढेर से अपशब्द ।

मेरे वृक्षत्व के इन फूलों ने

निश्चय ही उसे कुछ तो किया ही होगा,

पर सुगंधित तो नहीं की ।

सबका अपना-अपना वृक्षत्व है ।

माँ

मैं नहीं जानता
क्योंकि नहीं देखा है कभी-
पर, जो भी
जहाँ भी लीपता होता है
गोबर के घर-आँगन,
जो भी
जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे-कुंकुम से अल्पना,
जो भी
जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है
मैथी की भाजी,
जो भी
जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिये निहारता होता है
दूर तक का पथ-
वही,
हाँ, वही है माँ ! !

केवल हिम

हिम, केवल हिम-
अपने शिवःरूप में
हिम ही हिम अब!
रग-गंध सब पिरत्याग कर
भोजपत्रवत हिमाच्छादित
वनस्पित से हीन
धरित्री-
स्वयं तपस्या।
पता नहीं
किस इतिहास-प्रतीक्षा में
यहाँ शताब्िदयाँ भी लेटी हैं
हिम थुल़्मों में।
शिवा की गौर-प्रलम्ब भुजाआें सी
पवर्त-मालाएँ
नभ के नील पटल पर
पृथिवी-सूक्त लिख रहीं।
नीलमवणीर् नभ के
इस बर्ह्माण्ड-सिन्धु में
हिम का राशिभूत
यह ज्वार
शिखर, प्रतिशखर
गगनाकुल।

याक सरीखे
धमर्वृषभ इस हिम प्रदेश में

पीले फूल कनेर के

पीले फूल कनेर के
पट अंगोरते सिन्दूरी बड़री अँखियन के
फूले फूल दुपेर के।

दौड़ी हिरना
बन-बन अंगना
वोंत वनों की चोर भुर लिया
समय संकेत सुनाए,
नाम बजाए,
साँझ सकारे,
कोयल तोतों के संग हारे
ये रतनारे-
खोजे कूप, बावली झाऊँ
बाट, बटोही, जमुन कछारे
कहाँ रास के मधु पलास हैं?
बट-शाखों पर सगुन डालते मेरे मिथुन बटेर के
पीले फूल कनेर के।

पाट पट गए,
कगराए तट,
सरसों घेरे खड़ी हिलती-
पीत चँवरिया सूनी पगवट
सखि! फागुन की आया मन पे हलद चढ़ गई
मेंहदी महुए की पछुआ में
नींद सरीखी लान उड़ गई
कागा बोले मोर अटरिया
इस पाहुन बेला में तूने
चौमासा क्यों किया पिया?
यह टेसू-सी नील गगन में-
हलद‍ चाँदनी उग आई री
उग आई री
अभी न लौटे उस दिन गए सबेर के!
पीले फूल कनेर के।

यह सोनजुही-सी चाँदनी

यह सोनजुही-सी चाँदनी
नव नीलम पंख कुहर खोंसे
मोरपंखिया चाँदनी।

नीले अकास में अमलतास
झर-झर गोरी छवि की कपास
किसलयित गेरुआ वन पलास
किसमिसी मेघ चीखा विलास
मन बरफ़ शिखर पर नयन प्रिया
किन्नर रम्भा चाँदनी।

मधु चन्दन चर्चित वक्ष देश
मुख दूज ढँके मावसी केश
दो हंस बसे कर नैन-वेश
अभिसार रंगी पलकें अशेष
मन ज्वालामुखी पर कामप्रिया
चँवर डुलाती चाँदनी।

गौरा अधरों पर लाल हुई
कल मुझको मिली गुलाल हुई
आलिंगन बँधी रसाल हुई
सूने वन में करताल हुई
मन नारिकेल पर गीत प्रिया
वन-पाँखी-सी चाँदनी।

किरन-धेनुएँ

उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला।

पूँछ उठाए चली आ रही
क्षितिज जंगलों से टोली
दिखा रहे पथ इस भूमा का
सारस, सुना-सुना बोली

गिरता जाता फेन मुखों से
नभ में बादल बन तिरता
किरन-धेनुओं का समूह यह
आया अन्धकार चरता,
नभ की आम्रछाँह में बैठा बजा रहा वंशी रखवाला।

ग्वालिन-सी ले दूब मधुर
वसुधा हँस-हँस कर गले मिली
चमका अपने स्वर्ण सींग वे
अब शैलों से उतर चलीं।

बरस रहा आलोक-दूध है
खेतों खलिहानों में
जीवन की नव किरन फूटती
मकई औ’ धानों में
सरिताओं में सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला।