पम्मी | PAMMI

तुम्हारी याद आ जाती है.

"मैं जब भी मुस्कुराती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है
या यदि मायूस होती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

यूँ तो मसरूफ़ रहती हूँ
रोज़ कारगुज़ारियों में,
फ़ुरसत जैसे ही पाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

लब मेरे अब अक्सर
ख़ामोश-से रहते हैं;
ज़रा भी गुनगुनाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

ज़ीस्त-ए-ख़िज़ां में बिखरे
बेश़ुमार पत्तों के दामन से
ग़ुल चुनने लग जाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

श़ब के ग़ुज़रे पहर
पलकों के आँगन में
ख़्वाब बुनने लग जाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

फ़िर भोर में सूरज की
पहली किरण के जगते ही
अँगड़ाई अग़र लेती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

यूँ तो ज़िन्दगी गुज़रती है
मन की तनहाई में :
महफ़िल ग़र कभी सजाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है. कितने लम्हे बीतते हैं
यादों की रानाई में
बाहर जब उनसे आती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

भूले-बिसरे कितने ग़म
संगी बनकर चलते हैं
फ़िर भी जब खिलखिलाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

साथ जीते हो तुम
जैसे मेरे अन्तर में
जब भी साँस लेती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

क्या माँगूँ मैं भला
अपने लिए ख़ुदा से ?
यही सोचती रह जाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है.

दुआ में हाथ उठाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है,
दुआ में हाथ उठाती हूँ
तुम्हारी याद आ जाती है !