Raheem

रहीम / Raheem

रहीम दास के दोहे सार के साथ

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे होय ।

संकट में हर कोई प्रभु को याद करता है खुशी में कोई नहीं, अगर आप खुशी में भी याद करते तो संताप होता ही नही ।

जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं ।
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं ।

रहीम दास कहते हैं कि बड़े को छोटा कहने से बड़े की भव्यता कम नहीं होती,
क्योंकि गिरधर को कन्हैया कहने से उनके गौरव में कमी नहीं होती ।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि ।
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि ।

रहीम दास कहते हैं कि बड़ी चीजों को देखते हुए, छोटी चीजों को फेंक देना नहीं चाहिए, क्योंकि जहां छोटी सुई का इस्तेमाल किया जाता है, वहां बड़ी कृपाण क्या कर सकती है? मतलब हर चीज़ का अपना एक अनोखा मोल, उपयोग होता है । कोई भी चीज़ न बड़ी होती है और न ही छोटी होती है ।

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय ।
टूटे पे फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ परी जाय ।

रहीम दास ने कहा है कि प्रेम का संबंध बहुत नाजुक होता है, इसे झटका देकर तोड़ना उचित नहीं होता । यदि यह धागा एक बार टूट जाता है, तो इसे जोड़ना मुश्किल होता है, और अगर यह जुड़ भी जाता है तो बीच में गांठ बन जाती है । ठीक वैसे ही आपसी संबंध टूट जाने पर जुड़ते नहीं और जुड़ते है तो भी मन में एक दरार सी हो जाती है ।

रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार ।
रहिमन फिरि-फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार ।

यदि हार टूट जाये तो उन हीरो को धागे में पीरों लेना चाहिये,
वैसे ही यदि आपके प्रियजन आपसे सौ बार भी रूठे तो उन्हें मना लेना चाहिये ।

दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं ।
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं ।

रहीम दास का कहना है कि काग और कोयल समान रूप से काले रंग के होते हैं । जब तक उनकी आवाज़ नहीं सुनाई देती तब तक उनकी पहचान नहीं होती है, लेकिन जब बसंत ऋतु आ जाती है, तो दोनों के बीच का अंतर कोयल की मीठी सुरीली आवाज से प्रकट हो जाता है ।

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय ।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ।

अपने भीतर के दंभ को दूर करके ऐसी मीठी बातें करनी चाहिए जिसे श्रवण कर के खुद को और दूसरों को शांति और ख़ुशी हो ।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग ।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग ।

रहीम दास ने कहा है कि जो लोग अपनी प्रकृति में अच्छे हैं वे खराब संगती में भी खराब नहीं हो सकते हैं,
जैसे विषैले सर्प सुगंधित चंदन के वृक्षों को लिपटे रहते है फिर भी चंदन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ठीक वैसे ही ।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात ।
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात ।

रहीम दास कहते हैं कि कोई भी स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती है, जैसा कि जब वसंत आती है तो पेड़ पर फल लगते है और जब शरद आती है तो सब गिर जाता है इसलिए विकट स्थिति में पछताना व्यर्थ है ।

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग ।
बांटन वारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग ।

रहीम कहते हैं कि धन्य है वो लोग जिनका जीवन सदा परोपकार के लिए बीतता है,
जिस तरह फूल बेचने वाले के हाथों में खुशबू रह जाती है ठीक वैसे ही इन परोपकारियों का जीवन भी खुश्बू से महकता रहता है ।

खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय ।
रहिमन करुए मुखन को, चाहिए यही सजाय ।

रहिम दास जी कहते हैं कि खीरे के कड़वाहट को दूर करने के लिए, इसके ऊपरी छोर को काटने के बाद उस पर लोन (नमक) लगाया जाता है। यह सजा उन लोगों के लिए सही है जो कड़वा शब्द कहते हैं।

रहिमन अंसुवा नयन ढरि, जिय दुःख प्रगट करेइ ।
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ ।

आँसू आँख से बाहर निकलते हैं और दिमाग की पीड़ा प्रकट करते हैं,
रहीम दास कहते है कि ठीक वैसे ही घर से निकाला गया ही घर के भेद खोलेगा ।

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय ।
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय ।

रहीम दास कहते हैं कि आपके मन की उदासी को अपने मन के भीतर ही छुपाये रखे, क्योंकि दूसरों की उदासी को सुनने के बाद लोग इठला भले ही लेते है लेकिन उसे बाँट कर कम करने वाले बहुत कम लोग होते हैं ।

तरुवर फल नहीँ खात हैं, सरवर पियहि न पान ।
कही रहीम पर काज हित, संपति संचही सुजान ।

पेड़ अपने फल-फूल स्वयं नहीं खाते हैं, और नदियाँ भी अपना जल स्वयं नहीं पीती हैं ।
उसी प्रकार सज्जन लोग वे हैं जो दूसरों की सेवा के लिए, दान के काम के लिए अपने धन दौलत को खर्च करते हैं ।

जे गरिब सों हित करें, ते रहीम बड़ लोग ।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग ।

जो लोग गरीब के हित में हैं, बड़े महान लोग हैं । जैसे सुदामा कहते हैं कि कान्हा की मैत्री भी एक भक्ति है ।

रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय ।
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय ।

रहीम कहते हैं कि संघर्ष जरूरी है क्योंकि इस समय के दौरान ही यह ज्ञात होता है कि हमारे हित में कौन है और अहित में कौन है ।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।

बड़ा होना इसका मतलब यह नहीं है कि किसी के लिए अच्छा है । जैसे खजूर के पेड़ की तरह, वो बहुत बड़ा है लेकिन इसके फल इतनी दूर है कि इसे तोड़ना मुश्किल है और काफिर को छाँव के काम भी नहीं आता ।

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर ।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर ।

रहीम दास कहते है कि जब ख़राब समय चल रहा हो तो मौन रहना ही ठीक, क्योंकि जब अच्छा समय आता हैं तब काम बनते विलंब नहीं होता इसलिए हमेशा अपने सही समय का सब्र करे ।

मन मोटी अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय ।
फट जाये तो न मिले, कोटिन करो उपाय ।

रस, फूल, दूध, मन और मोती जब तक स्वाभाविक सामान्य रूप में है तब तक अच्छे लगते है लेकिन यह एकबार टूट-फट जाए तो कितनी भी युक्तियां कर लो वो फिर से अपने स्वाभाविक और सामान्य रूप में नहीं आते ।

बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय ।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय ।

रहीम दास कहते हैं कि मनुष्य को बुद्धिमानी से व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि अगर किसी कारण से कुछ गलत हो जाता है, तो इसे सही करना मुश्किल होता है, क्योंकि एक बार दूध खराब हो जाये, तो हजार कोशिश कर ले उसमे से न तो मक्खन बनता है और न ही दूध ।

जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह ।
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह ।

रहीम दास कहते हैं कि जैसे इस धरती पर सर्दी, गर्मी और बारिश गिरती है और जैसे यह सब पृथ्वी सहन करती है, उसी तरह मनुष्य के शरीर को भी सुख और दुख उठाना और सहना सीखना चाहिए ।

ओछे को सतसंग रहिमन तजहु अंगार ज्यों ।
तातो जारै अंग सीरै पै कारौ लगै ।

नीच लोगों का साथ छोड़ देना चाहिए क्योंकि उनसे हर स्तर पर, हमें क्षति ही होती है । जैसे जब कोयला गर्म होता है तब तक शरीर को जलाता है और जब ठंडा हो जाता है, तो शरीर को काला करता है ।

रहिमन मनहि लगाईं कै, देख लेहूँ किन कोय ।
नर को बस करिबो कहा, नारायण बस होय ।

रहिम दास कहते हैं कि यदि आप अपने मन को एक स्थान पर रखकर काम करेंगे, तो आप अवश्य ही सफलता प्राप्त कर लेंगे, अगर मनुष्य एक मन से ईश्वर को चाहे तो वह ईश्वर को भी अपने वश में कर सकता है ।