रवीन्द्र प्रभात /Ravindra Prabhat

रवीन्द्र प्रभात /Ravindra Prabhat

बेटियाँ, बेटियाँ, बेटियाँ

बेटियाँ, बेटियाँ, बेटियाँ
बन रही तल्ख़ियाँ, बेटियाँ।

सुन के अभ्यस्त होती रही,
रात-दिन गालियाँ, बेटियाँ।

सच तो ये है कि तंदूर में,
जल रही रोटियाँ, बेटियाँ।

घूमती है बला रात-भर,
बंद कर खिड़कियाँ,बेटियाँ।

कौन कान्हा बचाएगा अब,
लग रही बोलियाँ, बेटियाँ।

तुम लौट आना अपने गाँव

जब झूमे घटा घनघोर
और टूटकर बरस जाए
तुम लौट आना अपने गाँव
अलाप लेते हुए धानरोपनी गीतों का
कि थ्रेसर-ट्रेक्टर के पीछे खड़े बैल
तुम्हारा इन्तज़ार करते मिलेंगे
कि खेतों में दालानों में मिलेंगे
पेड़ होने के लिए करवट लेते बीज
अमृत लुटाती-
बागमती की मन्द-मन्द मुस्कराहट
माटी में लोटा-लोटाकर
मौसम की मानिंद
जवान होती लडकियाँ
पनपियायी लेकर प्रतीक्षारत घरनी
और गाते हुये नंग-धड़ंग बच्चे
"काल- कलवती-पीअर -धोती
मेघा सारे पानी दे .... ।"

जब किसी की कोमल आहट पाकर
मन का पोर-पोर झनझना जाए
और डराने लगे स्वप्न
तुम लौट आना अपने गाँव
कि नहीं मिलेंगे मायानगरी में
झाल-मजीरा / गीत-जोगीरा / सारंगा-
सदाबरीक्ष/ सोरठी- बिरज़ाभार / आल्हा -
उदल / कज़री आदि की गूँज
मिलेंगे तो बस -
भीड़ में गायब होते आदमी
गायब होती परम्पराएँ
पॉप की धुन पर
संगीत के नए-नए प्रयोग
हाथ का एकतारा छोड़कर
बंदूक उठा लेने को आतुर लोकगायक
वातानुकूलित कक्ष में बैठकर
मेघ का वर्णन करते कालीदास
और बाबा तुलसी गाते हुए
"चुम्मा-चुम्मा....।"

तुम लौट आना अपने गाँव
कि जैसे लौट आते हैं पंछी
अपने घोसले में
गोधूलि के वक़्त
मालिक के भय से / महाजन की धमकी से
बनिए के तकादों से
कब तक भागोगे
कि नहीं छोड़ते पंछी अपनी डाल
घोंसला गिर जाने के बावजूद भी....।

तुम लौट आना अपने गाँव
कि तुम्हारे भी लौटेंगे सुख के दिन
अनवरत जूझने के बाद
कि तुम भी करोगे अपनी अस्मिता की रक्षा
सदियों तक निर्विकार
जारी रखोगे लडाई
आख़िरी समय तक
मुस्तैद रहोगे हर मोर्चे पर
किसी न किसी
बेबस- लाचार की आँखों में
पुतलियों के नीचे रक्तिम रेखा बनकर....।

तुम लौट आना अपने गाँव
कि नहीं छोड़ती चीटियाँ
पहाडों पर चढ़ना
दम तोड़ने की हद तक।

अपनी दीवानगी को गंवाना फ़िज़ूल

अपनी दीवानगी को गंवाना फ़िज़ूल ,
जुगनुओं रोशनी में नहाना फिजूल ।

किस्त में खुदकुशी इश्क का है चलन ,
इश्क दरिया है पर डूब जाना फ़िज़ूल ।

चांदनी रात में चांद के सामने यूँ -
आपका इसकदर रूठ जाना फ़िज़ूल ।

शर्त है प्यार में प्यार की बात हो ,
प्यार को बेवजह आजमाना फ़िज़ूल ।

लफ्ज़ को बिन तटोले हुये ये'प्रभात'
बज़्म में कोई भी गीत गाना फ़िज़ूल ।

जो शीशे का मकान रखता है

जो शीशे का मकान रखता है ,
वही पत्थर की ज़ुबान रखता है ।

गुम कर-करके परिन्दों के पर ,
बहोत ऊंची उडान रखता है ।

है जो तहज़ीव से नही वाकिफ ,
घर में गीता - कुरान रखता है ।

खोटा चलता उसका ही सिक्का ,
जो अमन की दुकान रखता है ।

अब तो बेटा भी बाप की खातिर ,
घर के बाहर दलान रखता है ।

कहता है खूबसूरत ग़ज़ल जानिब ,
छुपा करके दीवान रखता है ।

बहुत खराब है 'प्रभात' ये शराब ,
क्यों मौत का सामान रखता है ?

जहाँ शेर-बकरी साथ बैठे वह पड़ाव चाहिए

हमें-
स्वच्छ , प्रदूषण रहित
शहर-कस्वा-गाँव चाहिए ।
जहाँ शेर-बकरी साथ बैठे
वह पड़ाव चाहिए ।।


हमें नहीं चाहिए
कोई भी सेतु
इस उफनती सी नदी को
पार करने हेतु
हाकिम और ठेकेदार
पैसे हज़म कर जाएँ
और उद्घाटन के पहले
टूटकर बिखर जाएँ
हमें पार करने के लिए
बस एक नाव चाहिए ।
जहाँ शेर-बकरी साथ वैठे
वह पड़ाव चाहिए ।।


हमें नही चाहिए
कारखानों का धुँआ
जल- जमाव
सुलगता तेल का कुँआ
चारो तरफ
लौदस्पिकर की आवाज़
प्रदूषित पानी
और मंहगे अनाज
सुबह की धूप, हरे- भरे
पेड़ों की छाँव चाहिए ।
जहाँ शेर-बकरी साथ बैठे
वह पड़ाव चाहिए ।।


हमें नहीं चाहिए
रिश्वत के घरौंदे
जिसमें रहते हों
वहशी / दरिन्दे
मंडी में -
औरत की आबरू बिके
असहायों की आंखों से
रक्त टपके
जहाँ पूज्य हो औरत
हमें वह ठांव चाहिए ।
जहाँ शेर- बकरी साथ बैठे
वह पड़ाव चाहिए ।।

एक कतरा ज़िन्दगी जो रह गई है

एक कतरा ज़िन्दगी जो रह गई है,
घोल दे सब गंदगी जो रह गई है।

भीख देगा कौन तुझको, ये बताना-
तुझमें ये आवारगी जो रह गई है?

आँख से आँसू छलक जाते अभी तक,
इश्क में संजीदगी जो रह गई है!

चाँदनी में घूमता है रात-भर वह,
चाँद में दोशीज़गी जो रह गई है!

बेबसी की बात करना छोड़ दे अब,
ख़ुदगर्ज़-सी ये बंदगी जो रह गई है!

सर क़लम कर मेरा, खंजर फेंक दे,
आँख में शर्मिन्दगी जो रह गई है!

फासला 'प्रभात' से है इसलिए, बस,
आपकी नाराज़गी जो रह गई है।

अस्पताल, चिकित्सक और दर्द .....

जब -
बीमार अस्पताल की
बीमार खाट पर पडी - पडी
मेरी बूढ़ी बीमार माँ
खांस रही थी बेतहाशा
तब महसूस रहा था मैं
कि, कैसे -
मौत से जूझती है एक आम औरत ।

कल की हीं तो बात है
जब लिपटते हुये माँ से
मैंने कहा था , कि -
माँ, घवराओ नही ठीक हो जाएगा सब ..... ।

सुनकर चौंक गयी माँ एकवारगी
बहने लगे लोर बेतरतीब
सन् हो गया माथा
और, माँ के थरथराते होंठों से
फूट पडे ये शब्द -
"क्या ठीक हो जाएगा बेटा !
यह अस्पताल ,
यह डॉक्टर ,
या फिर मेरा दर्द ........?