अंजुम रूमानी / Anjum Rumani

अंजुम रूमानी / Anjum Rumani

दुखी दिलों की लिए ताज़याना रखता है

दुखी दिलों की लिए ताज़याना रखता है
हर एक शख़्स यहाँ इक फ़साना रखता है

किसी भी हाल में राज़ी नहीं है दिल हम से
हर इक तरह का ये काफ़िर बहाना रखता है

अज़ल से ढंग हैं दिल के अजीब से शायद
किसी से रस्म-ओ-रह-ए-ग़ाएबाना रखता है

कोई तो फ़ैज़ है कोई तो बात है इस में
किसी को दोस्त यूँही कब ज़माना रखता है

फ़कीह-ए-शहर की बातों से दर-गुज़र बेहतर
बशर है और ग़म-ए-आब-ओ-दाना रखता है

मुआमलात-ए-जहाँ की ख़बर ही क्या उस को
मुआमला ही किसी से रखा न रखता है

हमीं ने आज तक अपनी तरह नहीं देखा
तवक़्क़ुआत बहुत कुछ ज़माना रखता है

क़लंदरी है की रखता है दिल ग़नी ‘अंजुम’
कोई दुकाँ न कोई कार-ख़ाना रखता है

हम से भी गाहे गाहे मुलाक़ात चाहिए

हम से भी गाहे गाहे मुलाक़ात चाहिए
इंसान हैं सभी तो मसावात चाहिए

अच्छा चलो ख़ुदा न सही उन को क्या हुआ
आख़िर कोई तो क़ाज़ी-ए-हाजात चाहिए

है आक़बत ख़राब तो दुनिया ही ठीक हो
कोई तो सूरत-ए-गुज़र-औक़ात चाहिए

जाने पलक झपकने में क्या गुल खिलाए वक़्त
हर दम नज़र ब-सूरत-ए-हालात चाहिए

आएगी हम को रास न यक-रंगी-ए-ख़ला
अहल-ए-ज़मीं हैं हम हमें दिन रात चाहिए

वा कर दिए हैं इल्म ने दरिया-ए-मारिफ़त
अँधों को अब भी कश्फ़ ओ करामात चाहिए

जब क़ैस की कहानी अब अंजुम की दास्ताँ
दुनिया को दिल लगी के लिए बात चाहिए

हर चंद उन्हें अहद फ़रामोश न होगा

हर चंद उन्हें अहद फ़रामोश न होगा
लेकिन हमें इस वक़्त कोई होश न होगा

देखोगे तो आएगी तुम्हें अपनी जफ़ा याद
ख़ामोश जिसे पाओगे ख़ामोश न होगा

गुज़रे हैं वो लम्हे सदा याद रहेंगे
देखा है वो आलम कि फ़रामोश न होगा

हम अपनी शिकस्तों से हैं जिस तरह बग़ल-गीर
यूँ क़ब्र से भी कोई हम-आग़ोश न होगा

पी जाते हैं ज़हर-ए-गम-ए-हस्ती हो कि मय हो
हम सा भी ज़माने में बला-नोश न होगा

होने को तो दुनिया में कई पर्दा-नशीं हैं
लेकिन तेरी सूरत कोई रू-पोश न होगा

पाओगे न आज़ाद-ए-ग़म-अंजुम किसी दिल को
होगा ग़म-ए-फ़र्दा जो ग़म-ए-दोश न होगा

जहाँ तक गया कारवान-ए-ख़याल

जहाँ तक गया कारवान-ए-ख़याल
न था कुछ ब-जुज़ हसरत-ए-पाएमाल

मुझे तेरा तुझ को है मेरा ख़याल
मगर ज़िंदगी फिर भी हैं ख़स्ता-हाल

जहाँ तक है दैर ओ हरम का सवाल
रहें चुप तो मुश्किल कहें तो मुहाल

तेरी काएनात एक हैरत-कदा
शनासा मगर अजनबी ख़द-ओ-ख़ाल

मेरी काएनात एक ज़ख़्म-ए-कोहन
मुक़द्दर में जिस के नहीं इंदिमाल

नई ज़िंदगी के नए मकर ओ फ़न
नए आदमी की नई चाल-ढाल

हुए रूख़्सत अंजुम सहर के क़रीब
न देखा गया शायद अपना मआल

नहीं नाम ओ निशाँ साए का लेकिन यार बैठे हैं

नहीं नाम ओ निशाँ साए का लेकिन यार बैठे हैं
उगे शायद ज़मीं से ख़ुद-ब-ख़ुद दीवार बैठे हैं

सवार-ए-कश्ती-ए-अमवाज-ए-दिल हैं और ग़ाफ़िल हैं
समझते हैं की हम दरिया-ए-ग़म के पार बैठे हैं

उजाड़ ऐसी न थी दुनिया अभी कल तक ये आलम था
यहाँ दो चार बैठे हैं वहाँ दो चार बैठे हैं

फिर आती है इसी सहरा से आवाज़-ए-जरस मुझ को
जहाँ मजनूँ से दीवाने भी हिम्मत हार बैठे हैं

समझते हो जिन्हें तुम संग-ए-मील ऐ क़ाफ़िले वालो
सर-ए-रह-ए-ख़स्तगान-ए-हसरत रफ़्तार बैठे हैं

ये जितने मशग़ले हैं सब फ़राग़त के
न तुम बे-कार बैठे हो न हम बे-कार बैठे हैं

तुम्हें ‘अंजुम’ कोई उस से तवक़्क़ो हो तो हो वरना
यहाँ तो आदमी की शक्ल से बे-ज़ार बैठे हैं

है जो तासीर सी फ़ुग़ाँ में अभी

है जो तासीर सी फ़ुग़ाँ में अभी
लोग बाक़ी हैं कुछ जहाँ में अभी

दिल से उठता है सुब्ह-ओ-शाम धुआँ
कोई रहता है इस मकाँ में अभी

साथ है एक उम्र का लेकिन
कश्मकश सी है जिस्म-ओ-जाँ में अभी

मर न रहिए तो और क्या कीजे
जान है जिस्म-ए-ना-तावाँ में अभी

और कुछ दिन ख़राब हो लीजे
सूद अपना है इस ज़ियाँ में अभी

वो मनाज़िर मिरी निगाह में हैं
जो नहीं वहम में गुमाँ में अभी

नहीं फ़ारिग़ ज़मीन से 'अंजुम'
काम बाक़ी है आसमाँ में अभी

है वाक़िआ कुछ और रिवायत कुछ और है

है वाक़िआ कुछ और रिवायत कुछ और है
यारों को यानी हम से शिकायत कुछ और है

समझी गई जो बात हमारी ग़लत तो क्या
याँ तर्जुमा कुछ और है आयत कुछ और है

कुछ कम नहीं बला से ख़िलाफ़त ज़मीं की भी
यारब मिरी सज़ा में रिआयत कुछ और है?

ऐ गर्दिश-ए-ज़माना तिरा दौर हो चुका?
या हाल पर हमारे इनायत कुछ और है

करते हो जो बयान तुम 'अंजुम' बजा मगर
तारीख़ जो लिखेगी हिकायत कुछ और है

हम से बात में पेच न डाल

हम से बात में पेच न डाल
यूँ मत दिल के चोर निकाल

मरना है तो डरना क्या
चलता है क्यूँ चोर की चाल

जोगी को लोगों से काम
बीन बजा और साँप निकाल

आज का झगड़ा आज चुका
कल की बातें कल पर टाल

अपना झंझट आप नबेड़
अपनी गठरी आप सँभाल

बढ़ी है उतनी आबादी
पड़ा इंसानों का काल

'अंजुम' इश्क़ का दावा था
कैसा हाल है? कैसा हाल

कुछ अजनबी से लोग थे कुछ अजनबी से हम

कुछ अजनबी से लोग थे कुछ अजनबी से हम
दुनिया में हो न पाए शनासा किसी से हम

देते नहीं सुझाई जो दुनिया के ख़त्त-ओ-ख़ाल
आए हैं तीरगी में मगर रौशनी से हम

याँ तो हर इक क़दम पे ख़लल है हवास का
ऐ ख़िज़्र बाज़ आए तिरी हमरही से हम

देते हैं लोग आज उसे शाएरी का नाम
पढ़ते थे लौह दिल पे कुछ आशुफ़्तगी से हम

रहती है 'अंजुम' एक ज़माने से गुफ़्तुगू
करते नहीं कलाम ब-ज़ाहिर किसी से हम