अंजुम सलीमी / Anjum Saleemi

अंजुम सलीमी / Anjum Saleemi

आईना साफ़ था धुँधला हुआ रहता था मैं

आईना साफ़ था धुँधला हुआ रहता था मैं
अपनी सोहबत में भी घबराया हुआ रहता था मैं

अपना चेहरा मुझे कतबे की तरह लगता था
अपने ही जिस्म में दफ़नाया हुआ रहता था मैं

जिस मोहब्बत की ज़रूरत थी मेरे लोगों को
उस मोहब्बत से भी बाज़ आया हुआ रहता था मैं

तू नहीं आता था जिस रोज़ टहलने के लिए
शाख़ के हाथ पे कुम्लाया हुआ रहता था मैं

दूसरे लोग बताते थे के मैं कैसा हूँ
अपने बारे ही में बहकाया हुआ रहता था मैं

अच्छे मौसम में तग ओ ताज़ भी कर लेता हूँ

अच्छे मौसम में तग ओ ताज़ भी कर लेता हूँ
पर निकल आते हैं परवाज़ भी कर लेता हूँ

तुझ से ये कैसा तअल्लुक़ है जिसे जब चाहूँ
ख़त्म कर देता हूँ आग़ाज़ भी कर लेता हूँ

गुम्बद-ए-ज़ात में जब गूँजने लगता हूँ बहुत
ख़ामोशी तोड़ के आवाज़ भी कर लेता हूँ

यूँ तो इस हब्स से मानूस हैं साँसें मेरी
वैसे दीवार में दर बाज़ भी कर लेता हूँ

सब के सब ख़्वाब में तक़्सीम नहीं कर देता
एक दो ख़्वाब पस-अंदाज़ भी कर लेता हूँ

बुझने दे सब दिए मुझे तनहाई चाहिए

बुझने दे सब दिए मुझे तनहाई चाहिए
कुछ देर के लिए मुझे तनहाई चाहिए

कुछ ग़म कशीद करने हैं अपने वजूद से
जा ग़म के साथिए मुझे तनहाई चाहिए

उकता गया हूँ ख़ुद से अगर मैं तो क्या हुआ
ये भी तो देखिए मुझे तनहाई चाहिए

इक रोज़ ख़ुद से मिलना है अपने ख़ुमार में
इक शाम बिन पिए मुझे तनहाई चाहिए

तकरार इस में क्या है अगर के रहा हूँ मैं
तनहाई चाहिए मुझे तनहाई चाहिए

दुनिया से कुछ नहीं है सर-ओ-कार अब मुझे
बे-शक मेरे लिए मुझे तनहाई चाहिए

चला हवस के जहानों की सैर करता हुआ

चला हवस के जहानों की सैर करता हुआ
मैं ख़ाली हाथ ख़ज़ानों की सैर करता हुआ

पुकारता है कोई डूबता हुआ साया
लरज़ते आईना-ख़ानों की सैर करता हुआ

बहुत उदास लगा आज ज़र्द-रू महताब
गली के बंद मकानों की सैर करता हुआ

मैं ख़ुद को अपनी हथेली पे ले के फिरता रहा
ख़तर के सुर्ख़ निशानों की सैर करता हुआ

कलाम कैसा चका-चौंद हो गया मैं तो
क़दीम लहजों ज़बानों की सैर करता हुआ

ज़्यादा दूर नहीं हूँ तेरे ज़माने से
मैं आ मिलूँगा ज़मानों की सैर करता हुआ

दर्द-ए-विरासत पा लेने से नाम नहीं चल सकता

दर्द-ए-विरासत पा लेने से नाम नहीं चल सकता
इश्क़ में बाबा एक जनम से काम नहीं चल सकता

बहुत दिनों से मुझ से है कैफ़ियत रोज़े वाली
दर्द-ए-फ़रावाँ सीने में कोहराम नहीं चल सकता

तोहमत-ए-इश्क़ मुनासिब है और हम पर जचती है
हम ऐसों पर और कोई इल्ज़ाम नहीं चल सकता

चम चम करते हुस्न की तुम जो अशरफ़ियाँ लाए हो
इस मीज़ान में ये दुनियावी दाम नहीं चल सकता

आँख झपकने की मोहलत भी कम मिलती है 'अंजुम'
फ़क़्र में कोई तन-आसाँ दो-गाम नहीं चल सकता

दीवार पे रक्खा तो सितारे से उठाया

दीवार पे रक्खा तो सितारे से उठाया
दिल बुझने लगा था सो नज़ारे से उठाया

बे-जान पड़ा देखता रहता था मैं उस को
इक रोज़ मुझे उस ने इशारे से उठाया

इक लहर मुझे खींच के ले आई भँवर में
वो लहर जिसे मैं ने किनारे से उठाया

घर में कहीं गुंजाइश-ए-दर ही नहीं रक्खी
बुनियाद को किस शक के सहारे से उठाया

इक मैं ही था ऐ जिंस-ए-मोहब्बत तुझे अर्ज़ां
और मैं ने भी अब हाथ ख़सारे से उठाया

उसे छूते हुए भी डर रहा था

उसे छूते हुए भी डर रहा था
वो मेरा पहला पहला तजरबा था

अगरचे दुख हमारे मुश्तरक थे
मगर जो दो दिलों में फ़ासला था

कभी इक दूसरे पर खुल न पाए
हमारे दरमियाँ इक तीसरा था

वो इक दिन जाने किस को याद कर के
मिरे सीने से लग के रो पड़ा था

उसे भी प्यार था इक अजनबी से
मिरे भी ध्यान में इक दूसरा था

बिछड़ते वक़्त उस को फ़िक्र क्यूँ थी
बसर करनी तो मेरा मसअला था

वो जब समझा मुझे उस वक़्त 'अंजुम'
मिरा मेआर ही बदला हुआ था

उम्र की सारी थकन लाद के घर जाता हूँ

उम्र की सारी थकन लाद के घर जाता हूँ
रात बिस्तर पे मैं सोता नहीं मर जाता हूँ

अक्सर औक़ात भरे शहर के सन्नाटे में
इस क़दर ज़ोर से हँसता हूँ कि डर जाता हूँ

मुझ से पूछे तो सही आईना-ख़ाना मेरा
ख़ाल-ओ-ख़द ले के मैं हमराह किधर जाता हूँ

दिल ठहर जाता है भूली हुई मंज़िल में कहीं
मैं किसी दूसरे रस्ते से गुज़र जाता हूँ

सहमा रहता हूँ बहुत हल्क़ा-ए-अहबाब में मैं
चार दीवार में आते ही बिखर जाता हूँ

मेरे आने की ख़बर सिर्फ़ दिया रखता है
मैं हवाओं की तरह हो के गुज़र जाता हूँ

मैं ने जो अपने ख़िलाफ़ आप गवाही दी है
वो तिरे हक़ में नहीं है तो मुकर जाता हूँ