Sanjeev

जीवन कि निसछल धारा को अविचल चलने दुन्गा अविचल के पथ को आनंदित कर दुगां । निसछल जीने कि चाहत को मिटने नही दूगां । निसछल को निशछल ही जीने दूगां अविचल के धारा को अविचल चलने दूगां।न भेद लूगां अभेद का बस जीवन को जस तस चलने दूगां।जीवन कि जीवन्त लीलाओ को अनवरत ही चलने दूगां। हर जीवन कि अभिलाषा पीछे नही लगाने दूगां।हर अभिलाषा के आगे झुकने नहीं दूगां। जीवन के हर पथ को शुध्द सजीवन ही बनने हू दूगां। जीवन के हर पल हर पल दृष्टा बन के जीने दूगां । जीवन के हर पल प्रेम पथिक बनने दूगां बस जीवन हर दिन अन्तिम जैसा जीने दूगां। जीवन को जीवन ही रहने दूगां।

कवि कि कविताओ का सम्मान करो धन से बड़ी धरोहर हैं। अन्तर मन को प्रेरित करती जैसा जीवन को बल देती । कविताओं कि बहती कँचन धारा शब्दों के द्वारा जीवन का रूख मोड़ देतीं है ।कवि कि कविताओं का सम्मान करो धन से बड़ी धरोहर हैं। गीत गाती गुनगुनाती शब्दों कि प्रज्वलित काया । देती सम्मान फूलो सा देती आलोचना फूलो सा। अन्तर मन को झकझोरती फूलों सा । जीवन मे घोलती महक फूलों सा । जीवन मे भरती इन्द्र धनुषी रन्गो को । कविताएं जीवन्त शब्दों की माला। कवि कि कविताओ का सम्मान करो धन से बड़ी धरोहर हैं।

विचार से विचार को मारा जा सकता हैं। ये कहिये कि विचार को विचार से परिवर्तित किया जा सकता है । सकार से नकार या नकार को सकार । जीवन के हर पहलू अपने स्वयं के हाथ मे है।

खोई खोई रे खोया खोया रे न जाने कहा कहा मनवा फिरत रे । चितवा डोली डोली डोलत रे ।मनवा कुछ खोजी खोजी रे बहरवा। इस खोजी मे भुला अपना घरवा अपन स्वरूपवा रे।जब मनवा बैरागी हुआ तब से कुछ ख्याल जगल बा एक मार्ग मिलल बा अपने घरवा का ।अस मंजस बा का करि कैसे चली तब याद जगल बा सतगुरू क उई एक आस जगल बा कि उ चलल सिखावन अईहं फिर घरवा पहुंचे क सबक सिखहं । तब स्व क बोध हो जाई तब कुछ अमिट अभिन्न हो जाई ।

अभिन्न घटित होना परम आनंद है।
निशब्द ही असली शब्द है मौन ही असली भाषा ।
हमारी अनन्त पराकाष्ठा जब शून्य मे प्रवेश करती है तब अन्तः करण कि उपलब्धी होती है। तब सारे प्रयास समर्पण हो जाते है ।