मकर संक्रांति पर कविता | MAKAR SANKRANTI POEM IN HINDI

आसमान का मौसम बदला
बिखर गई चहुँओर पतंग।
इंद्रधनुष जैसी सतरंगी
नील गगन की मोर पतंग।।
मुक्त भाव से उड़ती ऊपर
लगती है चितचोर पतंग।
बाग तोड़कर, नील गगन में
करती है घुड़दौड़ पतंग।।

पटियल, मंगियल और तिरंगा
चप, लट्‍ठा, त्रिकोण पतंग।
दुबली-पतली सी काया पर
लेती सबसे होड़ पतंग।।
कटी डोर, उड़ चली गगन में
बंधन सारे तोड़ पतंग।
लहराती-बलखाती जाती
कहाँ न जाने छोर पतंग।।
डॉ. मोहम्मद साजिद खान

सूरज ने मकर राशि में प्रवेश कर
मकर संक्रांति के आने का दिया संदेश
ईंटों के जंगल में आज बहुत याद आया अपना देश
गन्ने के रस के उबाल से फैलती हर तरफ
सोंधी सोंधी वो गुड़ की महँक
कुटे जाते हुए तिलों का संगीत
साथ देते बेसुरे कण्ठों का सुरीला गीत
गंगा स्नान और खिचड़ी का स्वाद
रंगीन पतंगों से भरा आकाश
और जोश भरी “वो काटा” की गूँज
सर्दियों को अलविदा कहने की धूम
अब तो बस तुम्हारा साथ ही त्यौहार जैसा लगता है
तुम्हारी आँखों की चमक दीवाली जैसी
और प्यार के रंगों में होली दिखती है
तुम्हारे गालों के गुड़ में सना तिल
जब तुम्हारे होठों की मिठास में घुलता है
वही दिन मकर संक्रांति का होता है

हिमश्रृंगी काँधे पर मुस्कुराकर चढ़ने लगी धूप
अकड़े फैले कुहासे को बाँहों में समेटने लगी धूप
इंद्रधनुषी गठजोड़ से धरा ले रही फेरे गगन संग
प्रेम ऊष्मा भरी भावनाओं में पिघलने लगी धूप
अंगड़ाई लेते वृक्ष इठलाती पत्तियां चहकते पंछी
निखरती सजती प्रकृति पर दृष्टि रखने लगी धूप
लाल पीले वसन पहनाती रंगीन तितली सी फिरकती
फूलों के गहनो से आशा मधुमास बुलाने लगी धूप
कृष्ण को पुकारती निशा अश्रु पोंछती कलुषता हरती
राधा सी मोहनी फेरती बंसी धुन पे थिरकने लगी धूप
सूर्या चला उत्तरायण हिरणी सी उछल खूब इतराई
पतंगों संग मकर संक्रांति के तिल सी चटकने लगी धूप

आसमान में चली पतंग मन में उठी एक तरंग
लाल, गुलाबी, काली, नीली,
मुझको तो भाती है पीली
डोर ना इसकी करना ढीली
सर-सर सर-सर चल सुरीली
कभी इधर तो कभी उधर
लहराती है फर फर फर।

ऐसी एक पतंग बनाएं
जो हमको भी सैर कराए
कितना अच्छा लगे अगर
उड़े पतंग हमें लेकर
पेड़ों से ऊपर पहुंचे
धरती से अंबर पहुंचे
इस छत से उस छत जाएं
आसमान में लहराएं
खाती जाए हिचकोले
उड़न खटोले-सी डोले
डोर थामकर डटे रहें
साथ मित्र के सटे रहें
विजय पताका फहराएं
हम भी सैर कर आएं