Shailendra Lodha

शैलेन्द्र लोढ़ा | Shailendra Lodha

वो परियो का रूप होती है

क्या लिखूँ की वो परियो का रूप होती है

या कड़कती ठण्ड में सुहानी धूप होती है
वो होती है चिड़िया की चहचाहट की तरह
या फिर निच्चल खिलखिलाहट

क्या लिखूँ की वो परियो का रूप होती है
या कड़कती ठण्ड में सुहानी धूप होती है
वो होती है उदासी में हर मर्ज़ की दवा की तरह
या उमस में शीतल हवा की तरह
वो चिड़ियों की चहचाहट है
या फिर निच्चल खिलखिलाहट है

वो आँगन में फैला उजाला है
या मेरे गुस्से पे लगा ताला है
वो पहाड़ की चोटी पर सूरज की किरण है
वो जिंदगी सही जीने का आचरण है
है वो ताकत जो छोटे से घर को महल कर दे
वो काफ़िया जो किसी ग़ज़ल को मुक्कम्मल कर दे

क्या लिखूँ की वो परियो का रूप होती है
या कड़कती ठण्ड में सुहानी धूप होती है
वो होती है चिड़िया की चहचाहट की तरह
या फिर निच्चल खिलखिलाहट

वो अक्क्षर जो न हो तो वर्णमाला अधूरी है
वो जो सबसे जयादा जरूरी है
ये नहीं कहूँगा कि वो हर वक़्त सांस सांस होती है
क्यूकि बेटिया तो सिर्फ अहसास होती है

उसकी आँखें न मुझसे गुड़िया मांगती है ना खिलौना
कब आओगे बस एक छोटा सा सवाल सलोना
जल्दी आऊंगा अपनी मजबूरी को छिपाते हुए मैं देता हूँ जबाब
तारीख बताओ टाइम बताओ ,

वो उंगलियो पर करने लगती है हिसाब
और जब में नहीं दे पता सही सही जबाब,
अपने आंसुओ को छुपाने के लिए वो अपने चहरे पर रख लेती है किताब
वो मुझसे ऑस्ट्रेलिया में छुटिया ,

मर्सर्डीस की ड्राइव ,फाइव स्टार में खाने
नए नए आईपॉड्स नहीं मांगती ,
ना कि वो बहुत सरे पैसे अपने पिग्गी बैग में उड़ेलना चाहती है
वो बस कुछ देर मेरे साथ खेलना चाहती है

वही बेटा काम है बहुत जरूरी काम है में शूटिंग करना जरूरी है
नहीं करूँगा तो कैसे चलेगा ,

जैसे मजबूरी भरे दुनिया दारी के जबाब देने लगता हूँ
वो झूठा ही सही मुझे अहसास कराती है जैसे सब समझ गयी हो
लेकिन आँखें बंद करके रोती है,

सपने में खेलते हुए मेरे साथ सोती है
जिंदगी ना जाने क्यों इतना उलझ जाती है
और हम समझते है कि बेटियां सब समझ जाती है

माँ

""बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका-बासन
चिमटा फुकनी जैसी माँ
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ
चिड़ियों के चहकार में गुँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिन भर इक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा,माथा,
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पूराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ !!!"""

शायरी

जो भी करता है वो आसमां करता है,
रोशन इस जंहा को ये झिलमिल नहीं करती
ये तसल्ली है बुत से बात करने में,
वो जैसा भीतर होता है वैसा बाहर
कमाल का है वो वक़्त,
जब एहसास ही न हो कि सुबह है या शाम
आसमान वाले ने इंसान असली बनाये,
इंसान को देखिये, आसमान ही नकली बना डाला
ग़म जब भी आये दिल के दरवाज़े खटखटाके ,
हो के शर्मिंदा पलट जाये, ऐसे लगाओ ठहाके
ज़ुबाँ को ज़हमत देने की ज़रूरत क्या,
एक मुस्कान ही बहुत है ज़माने के लिए
वो जो देखते हैं इधर उधर,
ज़रा खुद को भी देख लें
खुदा से हमारा रिश्ता भी चश्मे और निगाह सा है,
वो जब साथ होता है सब कुछ साफ़ नज़र आता है
आँखें भी मुस्कुराती है, ज़िम्मेदारी सिर्फ होंठो की थोड़े ही है
हमारे मुल्क की खासियत,
हर वक़्त, चाय का वक़्त
सूखे पत्ते बिखरने लगें हैं अरमानों की तरह,
मौसम फिर बदल गया , इंसानों की तरह
सा दृश्य दृष्टि में था तो मन गुनगुना उठा,
कुदरत की इस पवित्रता को तुम निहार लो,
इस के गुणों को अपने मन में तुम उतार लो,
चमका लो आज लालिमा अपने ललाट की,
कण कण से झांकती हुई छवि विराट की,
अपनी तो आँख एक है, उस की हज़ार है,
ये कौन चित्रकार है
आसमान अनुपम , समंदर मौन,
प्रकृति तुम से खूबसूरत कौन
आँखों में थकन है तो क्या,
क़दमों को रुकने की आदत नहीं
कुछ न कह कर भी कहना कमाल है,
मुस्कान होंठों पर आँखों में सवाल है
खफा होने में क्या रखा है,
ज़रा हर शिकन मिटाने तो आ,
चुटकी भर ही सही, रंग लगाने तो आ
हंसी हर पल संग हो,
संतुष्टि के रंग हो,
भरी खुशियों से जीवन की झोली हो,
ऐसी ही होली हो