Susheel Awasthi

शुशील अवश्थी / Susheel Awasthi

बदल रहा है अपना यूपी

बदल रहा है अपना यूपी, अब दुनिया ये कहती है।
क्या सिर्फ इसी बदलाव को हम,
अपना मुस्तकबिल मान लें।
पुराने लुटेरे पार्टी बदल,
न फिर से हमारी जान लें।
जहाँ अशिक्षा और बेकारी,
गली-गली में रहती है।
बदल रहा है अपना यूपी, अब दुनिया ये कहती है।

जिसकी लाठी..... कानून व्यवस्था,
बनी हुई अपनी पहचान।
जहाँ दलाली और भ्रष्टता,
लेती है इन्सा की जान।
दासी बनकर जहाँ सिया,
दुःख सूर्पनखा से सहती है।
बदल रहा है अपना यूपी, अब दुनिया ये कहती है।

लोकतंत्र की शीर्ष महत्ता,
"राजन" सबको स्वीकार है।
बदलाव की परिभाषा हम बदलें,
अब इसकी दरकार है।
"लोकतंत्र" में "नोटतंत्र" की,
जहाँ भूमिका महती है।
बदल रहा है अपना यूपी, अब दुनिया ये कहती है।

जातिवाद के आह्वान, कई दल हौंक रहे हैं यूपी में|
सत्ता के बौराए स्वान,फिर भौंक रहे हैं यूपी में|
महंगाई को लानेंवाले,
भ्रष्टाचार मिटानें वाले|
ठेका मेरे दुःख का लेकर,
दुःख अपना निपटानें वाले|
योग गुरु और भोग गुरु,
सब पौंच रहे यूपी में|
सत्ता के बौराए स्वान,फिर भौंक रहे हैं यूपी में|

दंगों के शातिर आरोपी,
इनके सिर पर उनकी टोपी|
छल-प्रपंच के मुख्य प्रवक्ता|
आतंकी हित साधक आशक्ता|
लाकर अपनी-अपनी धौकनी,
सब धौंक रहे हैं यूपी में|
सत्ता के बौराए स्वान, फिर भौंक रहे हैं यूपी में|

विधान सभा चुनाव नें,
देखो बदला सबका रूप|
छलनी चलनी बोल रही,
और बोल रहा है सूप
"राजन" चुपा-चुप्प जनता से,
सब चौंक रहे हैं यूपी में||
सत्ता के बौराए स्वान, फिर भौंक रहे है यूपी में| सारा भारत देश है कहता,
महंगाई ने ले ली जान|
पर सरकारी विज्ञापन कहता,
हो रहा भारत निर्माण|
भ्रष्ट,लुटेरे मौज उड़ाते,
कार छोंड विमान से जाते|
हमको आपको सीख बताते,
३२ रुपये खर्च करो तो,
बन जाओ अमीर महान|
हो रहा भारत निर्माण|
देश के खातिर जान लड़ाओ,
गोली,डंडा, जेल को जाओ,
राष्ट्रघात में बम बरसाओ,
निरीह जनों की जान ले जाओ,
आओ मेरी जेल में आओ,
बिरयानी उडाओ बन मेहमान|
हो रहा भारत निर्माण|
जातिवाद,धर्मवाद बढाओ,
"राजन" बस नेता बन जाओ,
आतंकियों की क़र पैरवी,
गाओ जन गन मन का गान|
हो रहा भारत निर्माण|

हमनें अपनी बिटिया रिशिका को,
कुछ मिटटी के पात्र दिए|
खूब खुश है मेरी रिशिका,
घुमे दिन भर लिए-लिए|
जैसे चूल्हा,चाकी,बेलन,
पीढ़ा,तवा, भगोनें, कप|
अब तो दिनभर खाना बनता,
खाते मज़ा उठाते सब|
उसे नहीं मालूम है भोली,
भार गृहस्थी का कैसा?
ठंडी पड़ जाती है रसोई,
जब पास नहीं होता पैसा|
महँगाई डायन के निर्मम पंजो से,
है "सुशील" अन्जान अभी|
लड़ेगी वह भी इस डायन से,
आज नहीं तो कभी न कभी|
भारत माता की जय बोले,
जाको चाहिए|
अन्ना नहीं हजारों,
हमको लाखों चाहिए|
गाँव-गाँव तक फैली भ्रष्टता,
राजनीती में घुसी ध्रष्टता|
गोरे अंग्रेजों से मुक्त हुए,
जिन्हें भूरों से मुक्ति जरुरी,
अन्ना ताको चाहिए|
अन्ना नहीं हजारों,
हमको लाखों चाहिए|
देश चलायें ऐसे बन्दे,
जो हों सभ्य,"सुशील"|
पर चला रहें हैं,
हत्यारे,लम्पट,दुष्ट,कुशील|
वैसे ही दीपक जैसे,
घोर निशा को चाहिए|
अन्ना नहीं हजारों,
हमको लाखों चाहिए|
बढ़-चढ़कर मतदान से,
लोक का तंत्र भी निखरेगा|
वोट की चोट से
लम्पट जनप्रतिनिधि का,
अहंकार भी बिखरेगा|
इन पर द्रष्टि गडाओ वैसे,
जैसे पथ-भ्रष्ट पुत्र पर,
पिता को चाहिए|
अन्ना नहीं हजारों,
हमको लाखों चाहिए| भ्रष्टाचार, कुशासन पर अब, आये दिन होता है वार,
जाग रही है जनता अब, इस खातिर जारी प्रतिकार|
राजनीति और नेताओं से, उठा भरोसा अपना,
ये रोंकेंगे लम्पटता को, लगता सबको सपना|
जन-जन में है क्रोध, व्यग्रता करती हमें अधीर,
कोई आये और चुरा ले, जन मानस की पीर|
रामदेव और अन्ना में, दिख रहा हमें था नायक,
पर भ्रष्ट,लुटेरे जुटे हैं, साबित करनें को नालायक|
घुप्प अँधेरा बता रहा, अब भोर हमारे द्वार,
जाग रही है जनता अब, इस खातिर जारी प्रतिकार|
कहें अवस्थी "राजन" अब तो, सबको जागना होगा,
किसी एक को दे नहीं सकते, दुक्ख हरण का ठेका|
लोकतंत्र को अश्त्र, शस्त्र मतदान बनायेंगे,
जिसके दम हम क्रांति, भारतवर्ष में लायेंगे|
दिग्विजयी रावणों का दंभ हमें, अब करना होगा चूर,
भीख नहीं अधिकार माँगते, हम न मूरख मजबूर|
छिड़ी लड़ाई वही लडेगा, जिसको भारत से प्यार,
जाग रही है जनता अब, इस खातिर जारी प्रतिकार|
मन के मन को जानना,
और उसे पहचानना,
बहुत कठिन है यार|
कभी बहुत खुश,
कभी दुखी है,
कारन का कुछ पता नहीं है,
कभी वहां है कभी यहीं है,
मन की गति का पता नहीं है,
मन की मन-मन,
सुननेवाला,
व्यग्र व्यथित बनता मतवाला,
मन को मार,
कहाँ कोई जीता,
मन के मन में रावण बसता,
बसते लछिमन, राम व सीता|
मन के जाल से उबरा,
वही सुह्रद सुजन,
राम नाम की "मनका"
घूमे जिसके मन| जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना,
भ्रष्टाचारी अँधेरा कहीं रह न जाये|
बनाना हमें देश को शक्तिशाली,
हटाओ उन्हें जो लुटेरे बवाली|
जिन्होनें तर्कों-कुतर्कों का लेकर सहारा,
चूसा है हमको किया बेसहारा|
इन्हें कसके पीटो ये बचनें न पायें|
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाय|
हमें याद रखनी है "अन्ना" कहानी,
रामदेव की वह पिटाई पुरानी|
सत्ता के मद से जो लोग अंधे हुए हैं,
लूट और खसोट जिनके धंधे हुए हैं|
उठाओ कसम अब ये आनें न पायें,
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाय|
"राजन" अवस्थी का खुलकर ये कहना,
बहुत दिन सहा है अब आगे न सहना|
मतदान का अधिकार बाबा साहब दिए हैं,
लोकतंत्र की मशाल भारत कायम किये है|
वोट से बदलो व्यवस्था खून बहनें न पाए|
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये
दुनिया में बदलाव की देखो कैसी चली बयार|
बिछड़ चुके हैं अमेरिका और पाक जैसे मजबूत यार|
आग और दंगे बन बैठे विकसित देशों की पहचान|
भारत तरफ ताकती दुनिया सुनती हमको देकर कान|
लोकतंत्र,और अर्थव्यवस्था हमें और चमकानी है|
एक-एक नागरिक को जिसमें अपनी भूमिका निभानी है|
आनें वाले दिन अपनें होंगें और चुनौतीपूर्ण|
आओ करें तयारी ऐसी की हम होंगे परिपूर्ण|
रहें एक तो हर मुश्किल हो जाएगी आसान|
पाएंगे फिर खोया वैभव मान और सम्मान|
सुशील अवस्थी "राजन" मेरी एक तमन्ना भारी|
सारा विश्व लगाये भारत माता की जयकारी |