Tanha Ajmeri

तनहा अजमेरी/ Tanha Ajmeri

बरसात

बरसात अब थम चुकी है
कैसी नमी सी छाई हुई है हर तरफ
और उस पर ये रात का सन्नाटा ,
कितना मुसलाधार बरसा था पानी
हो धरती पे जैसे प्यासी, अतृप्त आत्माएं ,
पर क्या तृप्ति मिली ?

बरसात सुहानी होती है जब होती है क्षणिक
पर यह क्या श्रृष्टि है,
सब कुछ असंतुलित क्यूँकर -
किसान की धरती को मिला पानी अत्याधिक
फसल के नष्ट होने से भूखों मरेंगे लोग
परन्तु क्या हुआ, कम से कम
पीने को तो पानी मिला,
पर क्या तृप्ति मिली ?

फिर यह वेदना क्या है,
बाहर अँधेरे में झींगुरों का चिल्लाना क्यूँ,
इतना करुनामय विलाप
रोजाना की तो यह आवाज़ नहीं ;

मनुष्य तो चुप है, कितना शांत
अपने आप को छलता हुआ
उसके आँगन के पौधे में पानी
उसे झूठा आश्वासन देता हुआ,
पर क्या सचमुच तृप्ति मिली ?

मूक है, बरसात में डूबता भीगता मनुष्य
बोले भी तो क्या बोले ?
गंगादीन का मकान बह गया,
बह गयी पेढ़ के नीचे की
रहीम की नाई की दुकान ,
बूढ़ी अम्मा न पीला सकेगी चाय
बह गयी उसकी दियासिलाई.

इन सबसे बेखबर हम-तुम सो रहे हैं
संतुष्टि की चादर ओढ़े
स्वप्न में भला कौन पूछेगा
क्या सचमुच तृप्ति मिली ?

अब मच रहा है किसानो का हाहाकार
सुनाई दे रही है झींगुरों की चीत्कार
गूँज रहा है इनका रुदन
उजड़ गया है इनका आशियाना
कंही दूर कवि कोई लिख रहा है
बरसात पे इक मधुर गाना.

इस गरीबी और सूखों के देश में
आवश्यक नहीं की बरसात का सिर्फ गुणगान हो
जंहा तन न ढाका हो, पेट न भरा हो
वंहा आवश्यक है की अछे बुरे की पहचान हो.

उठ मनुष्य उठ
मत बैठ बन मूक दर्शक
अरे तू कुछ तो कर,कुछ तो कर
आगे बढ़ हक के लिया लड़ .
समझ तो सही की कभी कभी
अधिक ख़ुशी ही ग़म भी लाती है ,
बरसात फलदायक है जीवनदायिनी है,
परन्तु यह बरसात ही तो है
जो सैलाब भी लाती है,
परन्तु यह बरसात ही तो है
जो सैलाब भी लाती है.....

कभी देखना

चाँदनी रात में तारों को
आकाश की चादर में
अठखेलियाँ करते हुए
और महसूस करना
अपने अरमानों को मचलते हुए

कभी देखना और सुनना
अलसाई-सी किसी दोपहरी में
गूँजती सन्नाटे की आवाज़
तुम्हें बुलाती हुई
निद्रा से जगाती हुई

कभी देखना
तेज़ बहती नदी में
अपने ठहरे हुए अक्स को
तुम्हें निहारते हुए
राहत प्रदान करते हुए

कभी देखना
चिड़ियों के बच्चों को
हरी घास पर फुदकते
तुमसे बिल्कुल बेखबर, निडर
अपनी मनमानियाँ करते

कभी देखना
किसी गिलहरी को तेज़ी से
पेड़ की टहनियाँ चढ़ते उतरते
तुम्हें भी एक
उमंग में भरते हुए

कभी देखना
मूसलाधार बारिश से डरकर
खिडकी के पास छिपी बिल्ली को
तुमसे उसे न भगाने का
आग्रह करते हुए

कभी देखना
किसी फूल के ऊपर पड़ी
ओस की बूँद को
गुनगगुनाते हुए
मंद-मंद मुस्कुराते हुए

उस उगते और डूबते हुए
सूर्य को भी देखना
जो तुम्हारा प्रहरी-सा बना
सदा तुम्हारे साथ है
तुम्हारा हमसाया बना
खिलखिलाते हुए

सोचता हूँ क्या तुम
ये सब देखे भी पाओगे कभी
या यों ही व्यस्त रहोगे
अपनी मशीनी ज़िन्दगी में,
क्या तुम्हें कभी समय मिलेगा
कि तुम मेरे साथ आओगे
या यों ही तुम कल कल करते रहोगे
अपनी छोटी-सी ज़िन्दगी में

पर तुम देखना
मैं तुम्हें याद दिलाता रहूँगा
अपने गीतों के बोलों के ज़रिए
क्योंकि
मेरी कविता के लिए आवश्यक है
कि तुम यह सब देखो
और मैं देख पाऊँ तुमको
जीवन के सही मायने जानते हुए
दिमाग के परे
सिर्फ़ अपने मन की बातें मानते हुए

मैं तुम्हें याद दिलाता रहूँगा
तुम देखना।

मैं एक जगह टिक कर बैठूँ कैसे

मैं एक जगह टिक कर बैठूँ कैसे
पहले मौसम से कहों कि वह न बदले,
बारिश न हो और सूरज न ढ़ले
रात मे तारे न हों नभ पर,
पहले समय से कहो कि वह न बदले,
क्या तुम कर सकते हो ऐसे?

मैं एक जगह टिक कर बैंठूँ कैसे?

मुझे इंद्रधनुषी रंग पसंद हैं
मौसम सर्द और गर्म पसन्द हैं
मुझको कोयल के गाने की चाह है
जाऊं हर उस जगह जहाँ राह है
एक जगह इन सबको बुलाऊँ कैसे?
मैं एक जगह टिक कर बैठूँ कैसे?
मुझे कठपुतली का नाच पसन्द है
नया पुराना हर साज़ पसन्द है
पर्वत नदियाँ नाले पसन्द हैं
दोस्त सब गोरे काले पसन्द हैं
बच्चे प्यारे प्यारे पसन्द हैं
मैं किसी से नफ़रत करूँ तो कैसे?
मैं एक जगह टिक कर बैठूँ कैसे?
मुझे हर पगडन्डी अच्छी लगती है
हर नई सड़क मुझे जँचती है
लुभाती है मुझे सब गलियाँ
नाच, तमाशे और रंग-रलियाँ
मैं थक कर रुक जाऊँ कैसे?
मैं एक जगह टिक कर बैठूँ कैसे?
मुझे खेत और खलिहान पसंद है
दद्दू का घर और ननिहाल पसंद है।
असम, बिहार, बंगाल पसंद है।
मुझको पूरा हिंदुस्तान पसंद है
एक जगह बँध रह जाऊँ कैसे?
मैं एक जगह टिक कर बैंठूँ कैसे?
रो-रोकर जीना मुझे आता नहीं है
घुट-घुट कर मरना भाता नहीं है
मैं व्यापारी, साहूकार नहीं हूँ
जेब में दाब रख लूँ क्यों पैसे,
तुम रहते हो मैं रहूँ वैसे?
मैं एक जगह टिक कर बैंठूँ कैसे?

कुछ खास लोग

ऐसा भी महसूस किया है मैंने कभी
कि कुछ रिश्ते बेनाम ही ठीक होते हैं
तुम चाहो भी तो उन्हें नाम नहीं दे पाते हो
जो इतने मधुर, पाक और सच्चे होते हैं।
समाज की गन्दगी से अछूते
ये रिश्ते देते जीवन को नए आयाम
मरहम बन जाते ज़ख्म में
हर हालत में देते आराम।
ऐसा कुछ तुम्हारे साथ हो जाए
तो रिश्ते को सहेज के, सँभाल के रखना
अपने मन की बात मानना
दुनिया से न हरगिज़ डरना।
जिस तरफ़ ले जाए जीवन का बहाव
बह लेना
बोलता रहे कोई कुछ भी तुमको
सह लेना
जज़्बाती लगाव, इंसानियत का रिश्ता
प्रेम, स्नेह, प्यार, मोहब्बत
तुम जो चाहे इसे कह लेना।
लोगों की तो आदत हैं
बोलेंगे ही बोलेंगे
तुम्हारे सारे संबंधों को
तोलेंगे ही तोलेंगे।
चलों मैं तुमसे ही पूछता हूँ
तुम ही मुझकों बतला दो
मान लो मेंरी बातों को
या फिर उनको झुठला दो -
रिश्तों को नाम मिले हैं
तो क्या वे निभे हैं?
संबधों में जुड़कर क्या लोग
सचमुच संग चले है?
मैंने महसूस किया है
कुछ रिश्तों को
मैंने भरपूर जिया है
कुछ रिश्तों को -
जिनकी मुझे शक्ल और सूरत
नहीं दिखती
जिन्हें मैं
किसी जिस्म में कैद नहीं पाता
सीधा-सीधा
आत्मा से होता है जिनका नाता।
कितने अच्छे लगते हैं न ऐसे रिश्ते,
ऐसे रिश्ते
जो दिल के रिश्ते होते हैं।
क्या तुमने महसूस किया है ऐसा?
कभी - कभी?

दोस्ती

मिल गई हैं हाथों से छूटते छूटते खुशियाँ
गम़ चले गए हैं दूर, साथ रह गई खुशियाँ
दिल के कोने में कोई मुस्कुराने लगा है
अंधेरे में सितारा कोई टिमटिमाने लगा है
आते आते इन पलों ने कितना तरसाया है
हर मोड पर इम्तिहान लिया, आज़माया है
महसूस हो रहा है अपना कोई मौजूद है
मिलने बिछड़ने की ये दास्ताँ भी खूब है
तुमसे मिलकर मुझको करार आने लगा है
कह ही दूँ कि तुम पर प्यार आने लगा है
बोलते रहें सुनते रहें चाहे दिन हो या रतिया
चलती रहे सदा, कभी खत्म न हो ये बतिया
अब नशे में जैसे सब कुछ नहाने लगा है
छोटी-छोटी बातों में लुत्फ आने लगा है
ये जो मैंने तुमको अपना हाले दिल बताया है
बड़ी मुश्किल से इसे सबसे छुपाया है,
सुख दुख की बातें हम करते रहेंगे
तुमसे मिलकर मुझको करार आने लगा है
कह ही दूँ कि तुमपर प्यार आने लगा है

मनुष्य

पा-पाकर मंज़िल को
फिर चल देता हूँ आगे
खोजने नई मंज़िल को,
अजीब-सा स्वभाव है मेरा
बस चलता ही जाता हूँ
रुकता नहीं इक पल को।
चाँद और अंतरिक्ष मेरे लिए अब हो गए पुराने
खोज डाले हैं मैने नए कितने और ठिकाने
सैकड़ो पर्वत, मरुस्थल, नदिया और नाले
नया नहीं है कुछ भी, ये सब जाने पहचाने।
अब नहीं है कठिन कुछ
सब है मेरी मुट्टी में
कर लिया है मैंने सब कुछ
अपने ही काबू में,
सोचा था कभी रुक जाऊँगा
ले लूँगा विराम
जुटा लिए हैं साधन सारे
पर करता न आराम।
बैठ तो उकता जाता हूँ
चल दूँ तो रुकना चाहता हूँ
इसी उधेड़बुन में हरदम
आगे ही बढ़ता जाता हूँ
फिर भी नहीं होती है शान्त
ऐसी मेरी प्यास है,
और मिल जाए, और मिल जाए
ऐसी कैसी ये आस है?